देहरादून, पहाड़ न्यूज टीम

आज हमारे पहाड़ न्यूज रिपोर्टर हिमांशु शर्मा ने अभय शर्मा और यश भंडारी से कुछ बातचीत की है। अभय शर्मा और यश भंडारी ने पलायन मुद्दे और रोजगार पर बहुत जोर दिया है।

पौड़ी जिले के नीलकंठ के अभय शर्मा और टिहरी के अखोड़ी गांव के यश भंडारी ने कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है. उन्होंने बर्बाद हुए घरों को ‘पहाड़ी घरों’ में तब्दील कर एक नई पहचान दी है, साथ ही भविष्य के लिए रोजगार की उम्मीद जगाई है।

अभय शर्मा और यश भंडारी ने पहाड़ न्यूज से बताया कि उत्तराखंड में युवाओं का पलायन एक बड़ी समस्या है। लॉक डाउन में घर लौटे प्रवासी उत्तराखंडी युवाओं को पता चल गया था कि संकट में अपना ही घर आपको सुरक्षा दे सकता है। लॉक डाउन से सीख लेने के बाद कई युवाओं ने अपने शहर, अपने गांव में कुछ करने का फैसला किया और ऐसे कई युवाओं की कहानी तब सामने आई जब उन्हें शहरों की तुलना में गांव में ही रोजगार के बेहतर विकल्प मिले।इसी बीच कुछ युवाओं ने यहां के खंडहरों को रोजगार का जरिया बना लिया। यहां हम बता रहे हैं कि कैसे ये खंडहर आपकी यात्रा को यादगार बना सकते हैं।

ऐसा ही एक विकल्प है गांवों के गोठ के साथ बने पहाड़ी कच्चे मकानों को होम स्टे में बदलना है। मेरा विश्वास करो, पहले जब यह सिर्फ एक कल्पना थी, तब किसी को विश्वास नहीं था कि ग्रामीण क्षेत्रों में ये घर, जो शहरों के घरों से बिल्कुल अलग हैं, जो गांवों की रहने की स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे भी होम स्टे बन सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में उत्तराखंड की संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाला होम स्टे का नया प्रयोग सोशल मीडिया में काफी लोकप्रिय होने लगा है। अब लोग अपने गांव के इन पुराने घरों को नए सांस्कृतिक अलंकरण की शैली में ढालकर पर्यटकों को तेजी से आकर्षित कर रहे हैं।

इन दिनों ट्रेवलिंग लवर्स के बीच होटल के रूम रेंट पर लेने की बजाय होम स्टे का चलन बढ़ रहा है। लोगों की इन्हीं इच्छाओं को देखते हुए कई लोग अपने घरों में इस तरह की सुविधाएं मुहैया करवा रहे हैं। इससे ना सिर्फ टूरिस्ट्स को फायदा होता है बल्कि लोगों को भी आमदनी की अच्छा जरिया मिल जाता है। ऐसे ही एक शख्स ने अपने घर के गार्डन में एक टेंट लगाया है, इस टेंट को वो किराए पर भी देते हैं। खास बात यह है कि कंपनियां इस तरह की जगहों को ऑनलाइन लिस्ट भी करने लगी हैं। ऐसी ही जगहों में से एक जब आयरलैंड में प्रॉपर्टी रेंटल वेबसाइट पर दिखी, तो लोगों को यकीन ही नहीं हुआ।

पहाड़ी हाउस कॉन्सेप्ट

पौड़ी जिले के नीलकंठ के अभय शर्मा और टिहरी के अखोड़ी गांव के यश भंडारी ने कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है. उन्होंने बर्बाद हुए घरों को ‘पहाड़ी घरों’ में तब्दील कर एक नई पहचान दी है, साथ ही भविष्य के लिए रोजगार की उम्मीद जगाई है।

पौड़ी जिले के अभय शर्मा और टिहरी के यश भंडारी ने गांवों के बर्बाद हुए घरों को ‘पहाड़ी हाउस ‘ नाम देकर प्रचार शुरू किया. दोनों युवक पहले पौड़ी में राफ्टिंग-कैंपिंग के धंधे से जुड़े थे, लेकिन साल 2013 की आपदा ने उनके रिजार्ट और कारोबार को बर्बाद कर दिया। इसके बाद दोनों ने कुछ नया करने का फैसला किया। अब वे खंडहरों को ‘पहाड़ी घर’ बनाने में लगे हैं।

अपने गांव लौट रहे लोग

अभय शर्मा और यश भंडारी ने पहाड़ न्यूज से बताया कि घरों को किराए पर दिया जाता है और सजाया जाता है और सुसज्जित किया जाता है। घरों की पहाड़ी शैली से छेड़छाड़ नहीं की गई थी। अब यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं। इस तरह लोगों को घर से किराया मिलता है और आमदनी भी। इसे देख इन गांवों से पलायन कर चुके लोग वापस आ रहे हैं। उत्तराखंड के सीएम ने भी इन दोनों युवकों की तारीफ की है.

आप होम स्टे का आनंद ले सकते हैं

कहा जा रहा है कि अभय और यश के काम से उत्तराखंड सरकार को भी आइडिया आया। पलायन को रोकने के लिए सरकार ने फरवरी 2016 में ‘होम स्टे’ योजना शुरू की थी। यानी उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में कई खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं, लेकिन रहने, खाने-पीने की कमी के कारण लोग वहां नहीं आते हैं। ‘होम स्टे’ योजना के तहत ऐसे गांवों में दो से छह कमरों का घर बनाया जाएगा। पर्यटकों के ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था होगी। यहां लोग अपना खाना भी खुद बना सकते हैं। सब्जियां स्थानीय खेतों से खरीदी जाती हैं।

ग्रामीणों को भी मिला रोजगार

ग्रामीणों ने भी पहाड़ न्यूज से बताया कि अभय और यश की इस पहल का फायदा आसपास के ग्रामीणों को भी मिल रहा है. ये बच्चे पुराने मकानों को दस साल के लिए लीज पर लेते हैं। इससे मकान मालिक को भी हर साल करीब एक लाख रुपए किराए के रूप में मिलते हैं।

इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी तरह से पहाड़ी व्यंजन परोसे जाते हैं। जिसमें गहत की दाल, झंगोरे की खीर, भट्ट का राबडू, कौदे की रोटी, चौंसा, चुटक्वाणी, काफली, झौली आदि शामिल हैं। ये सभी उत्पाद आसपास के ग्रामीणों से खरीदे जाते हैं। इस तरह उन्हें अच्छी आमदनी भी होती है।

इन होम स्टे को पुराने घर के ढांचे को तोड़े बिना संशोधित किया गया है। जहां नीचे की तरफ गोठ है, वहीं एक तरफ रिसेप्शन बनाया गया है, सीढ़ियों और बाहरी दीवारों को उत्तराखंड की संस्कृति के अनुसार रंगा गया है। अंदर छोटे छोटे कमरों में सिंगल बेड से लेकर डबल बेड लगाए गए हैं। इन कमरों में किसी पंखे या एसी की जरूरत नहीं है, यह प्राकृतिक रूप से ठंडा और आरामदायक है।

अभय शर्मा और यश भंडारी ने पहाड़ न्यूज से बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जहां ऐसे घर वीरान पड़े हैं, अगर उन्हें बिना तोड़-फोड़ किए उसी तरह सजाया जाए और पर्यटकों के लिए होमस्टे में तब्दील किया जाए, तो उत्तराखंड के बहुत से लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार मिल सकता है। अब इसके लिए कैबिनेट ने होम स्टे योजना में सब्सिडी देना का प्रावधान किया है जिससे की होम स्टे योजना को आगे बढ़ने का लाभ मिलेगा जो की एक सराहनीय कार्य है।

अभय शर्मा और यश भंडारी ने पहाड़ न्यूज से बताया कि कोरोना काल मे जब आर्थिक रूप से हर किसी ने कप तोड़कर रख दिया था और ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी समस्या रोजगार की आई तो उनके लिए होम स्टे योजना एक बड़ी मदद के रूप में सामने आई है.

पहाड़ी हाउस को जमीनी हकीकत में बदलने वाले युवा अभय शर्मा का कहना है कि अगर सरकारें सहयोग करें तो राज्य में ‘पहाड़ी हाउस’ का मॉडल बड़े पैमाने पर विकसित किया जा सकता है.

बड़े होटलों के बजाय अब पर्यटक भी होम स्टे का रुख कर रहे हैं. पर्यटक होम स्टे संचालकों से पहाड़ी व्यंजन की डिमांड की जाती है,

गांव में खाली पड़े घरों को पर्यटन से जोड़ने की कवायद 2015 में शुरू की गई और इसे नाम दिया ‘पहाड़ी हाउस’। वर्ष 2015 में पहाड़ी हाउस’ बनने के बाद लोगो को रोजगार भी खूब मिला और लोगो का रूझान भी सही तरफ जा रहा है । पहाड़ी घर , गढ़वाल हाउस ,पासा ये सब पहाड़ी हाउस बनने के बाद हुए है।