बंदरकोट -कांडी-परोगी

जौनपुर (टिहरी गढ़वाल), 27 जून। जौनपुर क्षेत्र की लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक ऐतिहासिक राज मौण मेला शनिवार को अगलार्ड नदी में पूरे उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हो गया। इस वर्ष आयोजित मेले में करीब 10 हजार श्रद्धालुओं और ग्रामीणों ने भाग लिया। मेले के दौरान पारंपरिक ढोल-दमाऊं और रणसिंघा की गूंज के बीच हजारों लोगों ने इस अनूठी लोक परंपरा का साक्षी बनकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखा।

करीब 150 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक परंपरा का जौनपुर क्षेत्र में विशेष महत्व है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, टिहरी रियासत के समय स्वयं टिहरी नरेश भी इस राज मौण मेले में शामिल होते थे, जिससे इस आयोजन का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

इस वर्ष मेले के आयोजन की पांत (जिम्मेदारी) अठजुल क्षेत्र के ग्रामीणों के पास थी। परंपरा के अनुसार सुबह सभी पांतिदार और ग्रामीण कांडी में एकत्रित हुए। इसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों, ढोल-दमाऊं और गाजे-बाजे के साथ विशाल जुलूस सड़ब, बेल और परोगी होते हुए अगलाड़ नदी के निर्धारित मौण डालने वाले स्थान तक पहुंचा।

निर्धारित स्थल पर विधि-विधान के साथ टिमरू की छाल से तैयार पारंपरिक ‘मौण’ अगलाड़ नदी में डाला गया। मौण डालते ही हजारों लोग नदी में उतर पड़े और पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ने का रोमांचक दृश्य देखने को मिला। पूरे आयोजन के दौरान नदी तट पर उत्साह और उल्लास का वातावरण बना रहा तथा बड़ी संख्या में लोगों ने इस ऐतिहासिक परंपरा में भागीदारी निभाई।

मेला समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी क्षेत्रवासियों, स्वयंसेवकों तथा प्रशासन का आभार व्यक्त किया। समिति ने कहा कि राज मौण मेला केवल मछली पकड़ने का आयोजन नहीं, बल्कि जौनपुर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक है, जिसे आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जा रहा है।