घर बनाना , बसाना , कितनी पीढि़यों ने मेहनत की होगी आज वह मेहनत पल भर में खत्म हो गई । एक खूबसूरत रमणीक गांव इसे देखते ही वीरान हो गया है।
टिहरी , PAHAAD NEWS TEAM
ये कैसी विडम्बना थी कि कि कर्मभूमि को अपने ही हाथों उजाड़कर नष्ट करना पड़ा , इन लोगों ने अपने घरों को क्यों तोड़ दिया और अब खाना बदोश की तरह जीवन व्यतीत कर रहे ,
दरअसल, यह कोई दैवीय आपदा नहीं थी, यह मानव पूर्णता और सरकारी तंत्र का शासन था, यह एक ऐसा दृश्य था जिसकी कल्पना लोहारी गांव के ग्रामीणों ने सपने में भी नहीं की होगी. इन आँसुओं को देखने और सुनने के बाद यह आपके लिए क्षणभंगुर हो सकता है, लेकिन यह दंश इन ग्रामीणों को जीवन भर परेशान करेगा।
आपको बता दें, लखवाड़-ब्यासी बांध परियोजना के तहत 6 गांव डूब जाएंगे, जिसमें एक गांव लोहारी भी शामिल है, सरकारी तंत्र ने 48 घंटे में गांव को खाली करने का क्या अल्टीमेटम दिया, मानो गांव वालो के कलिजे चिरने लगे, लेकिन सभी सरकार के सामने भावनाओं, भावना टूट गई। किसी तरह लोग अपना सामान समेटने लगे। जौनसार में ज्यादातर घर लकड़ी के बने होंगे, लोगों ने सोचा कि अगर वे घर बनाने के लिए कहीं और जाएंगे, तो वे खिड़की, दरवाजे के लिए लकड़ी की व्यवस्था कैसे करेंगे, फिर उन्होंने अपने घरों से लकड़ी लेने के लिए इसे तोड़ना शुरू कर दिया। , घर बनाना , बसाना , कितनी पीढि़यों ने मेहनत की होगी आज वह मेहनत पल भर में खत्म हो गई । एक खूबसूरत रमणीक गांव इसे देखते ही वीरान हो गया है।
ग्रामीण अब खाना बदोश बनकर कुछ दूर एक स्कूल में शरणार्थी बन गए हैं और अपने गांवों, खेतों, घरों, इंच-इंच को देख रहे हैं। रोने से लोगों का हाल बेहाल है। आखिर देखते देखते ही उनका गांव चला गया, कुछ देर में गांव डूब जाएगा। इस गांव के डूबने से एक संस्कृति, एक सभ्यता, लोगों की एक पहचान भी पानी की गोद में चली गई है।

