देहरादून , PAHAAD NEWS TEAM

उत्तराखंड राज्य में कोविड काल के दूसरे चरण में सख्ती के लिये पुलिस चालान और जुर्माने ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है. हालांकि आम आदमी की मदद के लिए उत्तराखंड पुलिस का मिशन भी उत्साहजनक है। इसमें लोगों की कई प्रकार से मदद के साथ साथ अंतिम संस्कार मे पुलिस कंधा भी बन रही है। आम आदमी के सामने जहां रोजी-रोटी का संकट है। वहीं चालान व जुर्माने की राशि जुटाने के लिए लोगों को पैसे नहीं मिल पा रहे हैं. कई लोग कोर्ट चालान करवा रहे है। व्यवस्था बनाने के लिये चालान काटने को गलत नही ठहराया जा सकता है। लेकिन व्यवहारिक पक्ष से भी इंकार नही किया जा सकता है। सडकों पर हर आदमी बेवजह नही निकला होगा । 24 मार्च से शुरू हुई दूसरी लहर, करीब 20 दिन में 3 लाख से ज्यादा कार्रवाई की गई है ज्बकि करीब 5 करोड रूपये का जुर्माना वसूला गया है । 2011 की जनसंख्या के अनुसार उत्तराखंड की कुल जनसंख्या 1 करोड़ 86 लाख थी। हालांकि यह मौजूदा समय और वास्तविक आंकड़ों में अधिक हो सकती है, लेकिन आबादी से ज्यादा लगभग 5 करोड़ रुपए ज्यादा का जुर्माना वसूला जा चुका हैं। उत्तराखंड में मैदानी जिलों को छोड़ दें तो पहाड़ के जिलों में लोगों की आर्थिक स्थिति कुछ ज्यादा बेहतर नहीं है। वहीं मैदानी जिलो में बीते वर्ष आये लॉकडाउन रोटी रोजगार के संकट से ही लोग दूर नही हो पाये थे कि दूसरी लहर में कमर तोड चालान व जुर्माने की मोटी मोटी रकम ने लोगो को हिला कर रख दिया है। यातायात कार्यालय में लगी कतारों से लगता है कि सरकार का खजाना भऱने के लिये लगाई जा रही है। सख्ती के लिए चालान होना चाहिए, लेकिन कुछ व्यावहारिक पहलू या शर्तें भी देखनी चाहिए।

पुलिस प्रवक्ता और डीआईजी लॉ एंड ऑर्डर का कहना है कि राज्य में व्यवस्था बनी रहे संक्रमण खत्म हो इसके लिए पुलिस सख्ती से काम कर रही है. कई मामलों में व्यावहारिक पक्ष देखकर लोगों की मदद भी की जाती है, इस मामले पर राज्य सरकार के प्रवक्ता और वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि सरकार जनता का हर हित कर रही है. पिछले दिनों सरकार लॉकडाउन में दर्ज केस तक वापस ले चुकी है। इसलिए उत्पीड़न जैसा कुछ नहीं है और लोगों की हर संभव मदद की जाएगी।

व्यवस्था बनाने के लिए सख्ती जरूरी है, लेकिन जब व्यक्ति के पास दैनिक जीवन के लिए पैसे न हों। ऐसे में बड़े चालान और जुर्माना वहां से कैसे लायेगा ? हम पुलिस कार्रवाई की मंशा पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, बल्कि मौजूदा हालात में इसका व्यावहारिक पक्ष भी देखा जाना चाहिए कि हम इसकी पुरजोर वकालत कर रहे हैं.