अक्सर माता-पिता बच्चों के खर्राटों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकेत हो सकता है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. माधवी भारद्वाज ने हाल ही में इस विषय पर जागरूकता बढ़ाते हुए बताया कि बच्चों में खर्राटे लेना कई बार अंदरूनी समस्या की ओर इशारा करता है, जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।
उन्होंने बताया कि कई अभिभावक इसे वंशानुगत मानकर टाल देते हैं, लेकिन यह सोच गलत हो सकती है। उदाहरण के तौर पर एक ऐसे बच्चे का जिक्र किया गया, जिसका वजन उम्र के हिसाब से अधिक था और वह नियमित रूप से खर्राटे लेता था, फिर भी परिवार उसे पूरी तरह स्वस्थ मान रहा था। डॉक्टर के अनुसार मोटापा और खर्राटों के बीच सीधा संबंध हो सकता है।
खर्राटों का वैज्ञानिक कारण समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब नाक से फेफड़ों तक जाने वाले वायु मार्ग में किसी तरह की रुकावट आती है, तो हवा के टकराने से आवाज पैदा होती है, जिसे खर्राटा कहा जाता है। सामान्य सर्दी-जुकाम में कुछ समय तक ऐसा होना आम है, लेकिन अगर बच्चा ठीक होने के बाद भी लगातार खर्राटे ले रहा है, तो यह टॉन्सिल्स या श्वसन मार्ग में सूजन या वृद्धि का संकेत हो सकता है।
इस समस्या का असर बच्चे की नींद और दिनचर्या पर भी पड़ता है। ऐसे बच्चे अक्सर ठीक से सो नहीं पाते, जिससे वे दिनभर थके हुए, चिड़चिड़े और ध्यान केंद्रित करने में कमजोर हो जाते हैं। पढ़ाई और खेल-कूद दोनों पर इसका नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।
डॉक्टर के अनुसार बच्चों में खर्राटों के प्रमुख कारणों में एलर्जी, एडिनोइड्स और टॉन्सिल्स की समस्या शामिल हैं। इसके अलावा बढ़ता वजन भी श्वसन मार्ग पर दबाव डालता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है और खर्राटे बढ़ जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते सही जांच और इलाज से इस समस्या को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे के लक्षणों को नजरअंदाज न करें और डॉक्टर से परामर्श लेकर उचित उपचार कराएं, ताकि बच्चे की नींद, स्वास्थ्य और विकास बेहतर हो सके।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल जानकारियों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है।
(साभार)


Recent Comments