मेरे गांव गैड में आज भी जीवंत है ‘दुबड़ी’ की समृद्ध लोक परंपरा
शिक्षक सूर्य सिंह पंवार, गैड
उत्तराखंड की संस्कृति के रंग जुदा हैं, पहाड़ की संस्कृति के रंग में हर कोई रंगना चाहता है। लोक संस्कृति के माध्यम से ही उल्लास और परंपरा व रीति-रिवाज को बल मिलता है।
उत्तराखंड के पर्यटन स्थल मसूरी से सटा हुआ है टिहरी जनपद का जौनपुर विकासखंड। यह क्षेत्र लोक-संस्कृति के लिए विशेष जाना जाता है। यहां विभिन्न परंपराओं, धर्म, मेले, त्योहार, लोकनृत्य, संगीत की एक अपनी अलग पहचान है।
जौनपुर में त्योहारों की शुरुआत दुबड़ी के त्योहार से होती है। यह त्योहार भादों के महीने में, जब नई फसलें आती हैं, उन्हीं के पूजन एवं सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। जौनपुर में दुबड़ी के त्योहार से ही त्योहारों का शुभारंभ होता है। इस त्योहार में दो-तीन दिन तक लगातार खूब रौनक बनी रहती है। लंबे समय से ध्याणियां इस त्योहार में आने के लिए उत्साहित रहती हैं। बाकी त्योहारों में अपने नाते-रिश्तेदारों को निमंत्रण जाएं चाहे न जाएं, परंतु दुबड़ी के त्योहार में सभी नाते-रिश्तेदारों को निमंत्रण दिया जाता है।
दुबड़ी के त्योहार में लोग एक उत्साह से घरों की साफ-सफाई एवं गांव की सफाई आदि करते हैं। इस त्योहार का मुख्य भोजन पिनौले, समाले-असके, खीरे का रायता आदि है। मुख्य रूप में पिनौले विशेष भोजन माना जाता है।
पिनौले गेहूं, झंगोरा, कौणी आदि का सामूहिक रूप से आटा पीसकर बनाया जाता है। फिर उसे पतेले में हतार यानी थोड़ा पानी शेष रहने पर मुंगरी के डंडिया पतेले के अंदर डाले जाते हैं। उसे ही हतार कहते हैं। हतार लगाने के बाद आटे को अच्छी तरह से गूंथा जाता है। उसके बाद आटे पर हल्दी के पत्तों का हतार रखकर पतेले में पानी खोलने लगता है। तब उसके ऊपर रखा जाता है।
कुल मिलाकर जिस प्रकार मोमू बनाए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार उस आटे को 15–20 मिनट तक पकाकर तैयार किया जाता है। पकाने के बाद आटे को परात में रखकर गर्म पानी से पुनः गूंथ लेते हैं। उसके बाद पिनवाड़ी मुलायम हो जाता है। फिर गूंथे हुए आटे की छोटी-छोटी गोलियां बनाते हैं। उन गोलियों पर तीन उंगलियों से दबाकर निशान लगाए जाते हैं और उसके बाद उन गोलियों पर तीन उंगलियों के निशान लगाकर पिनौले तैयार किए जाते हैं।
पिनौले को घी, बूरा, खांड, चीनी के साथ मिलाकर खाते हैं। यह बहुत ही सुगंधित और पौष्टिक भोजन है। दुबड़ी का त्योहार शुरू होने से एक-दो दिन पहले से ही पिनौले बनने शुरू हो जाते हैं।
दुबड़ी को जौनपुर में दो तिथियों में मनाया जाता है। एक उस दिन जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, दूसरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के 6 दिन बाद जब दूब दी गई। असली दुबड़ी अष्टमी ही मानी जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि नई फसलों के आने पर पूजन आदि पर भी दुबड़ी मनाई जाती है।
सभी अनाज—झंगोरा, मंडुवा, कौणी, मुंगरी आदि अनाजों की बालियों को खेतों से उखाड़कर लाया जाता है। फिर उसका एक सामूहिक गठ्ठर बांधकर पंचायती आंगन में गड्ढा खोदकर उसे गड्ढे में बांधकर खड़ा कर देते हैं। उसी को दुबड़ी कहते हैं।
घर की महिलाएं और मायके से आई हुई ध्याणियों द्वारा शाम के समय इस दुबड़ी का पूजन किया जाता है। शाम के समय गांव के ढोल-बाजे बजना शुरू हो जाते हैं। बाजगी बंधुओं की महिलाओं के द्वारा भी दुबड़ी का विशेष पूजन किया जाता है।
दुबड़ी में सभी ग्रामीण एवं मेहमानों के द्वारा उत्साहपूर्ण गीत गाकर नृत्य किया जाता है। शाम के समय जब तक गांव के बाजगी के द्वारा सामूहिक आवाज पड़ती है कि सभी लोग दुबड़ी लूचने चौक पर पहुंचे, तब तक कोई भी दुबड़ी पर हाथ नहीं लगा सकता है।
सामूहिक आवाज पड़ने पर ही लोग चौक में इकट्ठा होकर दुबड़ी के गठ्ठन को सामूहिक रूप से उखाड़ते हैं और फिर चारों तरफ सीटी की आवाज पड़ते ही दुबड़ी के त्योहार को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
इस पर्व में जौनपुर की महिलाएं अपनी पारंपरिक पोशाक घाघरा, कुर्ता, डाटू व गले और कान के आभूषण पहनती हैं तथा पुरुष कुर्ता व पजामा पहनना ज्यादा पसंद करते हैं।
दूसरे दिन नवांई मनाई जाती है। इसमें विशेषकर पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है। पांडव नृत्य में भीम, भंवरिक, काली द्रौपदी, खाती अर्जुन अवतरित होते हैं। पांडव गाथा, मांगलिक गीत भी गाए जाते हैं। साथ में ढोल, दमाऊं, रणसिंघा उत्तराखंड के वाद्य यंत्रों के सुर-ताल पर जौनपुरी तांदी-रासो, सराई का आनंद भी लिया जाता है।
यह सभी त्योहारों में अगलाड़ घाटी का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है।

