जयप्रकाश उत्तराखंडी के संस्मरण में दर्ज हैं गिरफ्तारी, पुलिस की बर्बरता और दिल्ली तक पहुंचने की वह संघर्षपूर्ण कहानी
देहरादून।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में 2 अक्टूबर 1994 का दिन एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे पहाड़ शायद ही कभी भूल पाएगा। अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली की ओर कूच कर रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। गोलीकांड, गिरफ्तारियां, लाठीचार्ज और महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
इन्हीं घटनाओं को याद करते हुए उत्तराखंड आंदोलनकारी जयप्रकाश उत्तराखंडी ने अपने संस्मरण में उस दौर की कई ऐसी बातें साझा की हैं, जो आंदोलन के संघर्ष और उस समय के माहौल को करीब से समझने का अवसर देती हैं।
दिल्ली कूच की तैयारी और रास्ते में बढ़ता तनाव
जयप्रकाश उत्तराखंडी के अनुसार, सितंबर 1994 में वह मसूरी और कुछ अन्य उत्तराखंड आंदोलनकारियों के साथ बरेली सेंट्रल जेल से रिहा हुए थे। पुलिस की कथित मारपीट के बाद वे घायल अवस्था में दिल्ली पहुंचे थे। उनका उद्देश्य साफ था—देश की राजधानी में पहुंचकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन को और तेज करना।
वे बताते हैं कि उस समय उनके पास पैसे नहीं थे और कपड़े भी खराब हालत में थे। ऐसे में दिल्ली में उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े पूर्व राज्य मंत्री धीरेन्द्र प्रताप ने उनके रहने की व्यवस्था कराई। इसके बाद आंदोलनकारियों ने दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर धरना-प्रदर्शन शुरू किया।
लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश में आंदोलनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की खबरें लगातार सामने आने लगीं।
30 सितंबर की रात रामपुर तिराहे पर रोका गया पहाड़
अपने संस्मरण में जयप्रकाश उत्तराखंडी बताते हैं कि 30 सितंबर 1994 को दिल्ली जाते समय उन्होंने मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिस को पहाड़ से आने वाले यात्रियों की सख्ती से तलाशी लेते देखा।
उनके अनुसार, पुलिस बसों में सवार आंदोलनकारियों से पूछताछ कर रही थी। उन्होंने बाल बिखराने, पंखी ओढ़ने और बीमारी का बहाना बनाकर सीट पर लेट जाने जैसी तरकीब अपनाई, ताकि पुलिस की नजर से बच सकें। संस्मरण के मुताबिक, पुलिस ने उन्हें लाठियों की नोक से उठाकर पूछताछ की और बाद में छोड़ दिया।
वे बताते हैं कि अगले दिन, 1 अक्टूबर की सुबह, वह दिल्ली पहुंच गए।
2 अक्टूबर की रैली के लिए दिल्ली में जुट रहे थे आंदोलनकारी
दिल्ली में 2 अक्टूबर को प्रस्तावित उत्तराखंड रैली की तैयारियां तेज थीं। जयप्रकाश उत्तराखंडी के मुताबिक, वह कुछ साथियों के साथ 15 विंडसर प्लेस में ठहरे हुए थे।
सुबह करीब छह बजे साथी खुस्ले ने उन्हें जगाया और बताया कि मुजफ्फरनगर में पहाड़ से दिल्ली रैली के लिए आ रही आंदोलनकारियों की बसों पर फायरिंग की खबर है।
उस समय संचार के साधन बेहद सीमित थे। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का दौर नहीं था। खबरें लोगों तक टुकड़ों में पहुंच रही थीं। ऐसे में मुजफ्फरनगर से आने वाली सूचनाओं ने दिल्ली में मौजूद आंदोलनकारियों की चिंता और बढ़ा दी।
रामपुर तिराहा बना आंदोलन के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय
2 अक्टूबर 1994 की रात और उसके बाद की घटनाओं ने उत्तराखंड आंदोलन की दिशा बदल दी।
अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को रामपुर तिराहे पर रोक दिया गया। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ा और स्थिति हिंसक हो गई। पुलिस फायरिंग में कई आंदोलनकारियों की मौत हुई और अनेक घायल हुए।
महिला आंदोलनकारियों के साथ कथित अभद्रता और यौन हिंसा के आरोपों ने इस घटना को और गंभीर बना दिया। इन घटनाओं की जांच और न्याय की मांग वर्षों तक उत्तराखंड आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही।
‘आज भी सवाल वही है—बलिदानों का हिसाब कौन देगा?’
जयप्रकाश उत्तराखंडी अपने संस्मरण में उस दौर को याद करते हुए सवाल उठाते हैं कि जिन लोगों ने अलग उत्तराखंड राज्य के लिए अपना जीवन दांव पर लगाया, उनके संघर्ष और बलिदानों को क्या पर्याप्त सम्मान मिला?
उनका कहना है कि आंदोलनकारियों को उस समय पुलिस की लाठियों, गिरफ्तारियों और जेल यातनाओं का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने अपनी नौकरी, परिवार और व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना आंदोलन में भाग लिया।
उनके संस्मरण में यह पीड़ा भी दिखाई देती है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी आंदोलनकारियों की अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हुईं।
आज 32 साल बाद भी जिंदा है रामपुर तिराहा का सवाल
2 अक्टूबर 1994 को बीते अब 32 वर्ष हो चुके हैं। उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आए भी दो दशक से अधिक समय गुजर चुका है, लेकिन रामपुर तिराहा कांड की स्मृति आज भी उत्तराखंड के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में जिंदा है।
जयप्रकाश उत्तराखंडी की यह कहानी केवल एक व्यक्ति के दिल्ली पहुंचने की कहानी नहीं है। यह उस दौर की झलक है, जब पहाड़ के हजारों लोग एक अलग राज्य के सपने के लिए सड़कों पर उतर आए थे।
रामपुर तिराहा आज भी सिर्फ एक स्थान का नाम नहीं है—यह उत्तराखंड आंदोलन के बलिदान, पीड़ा और अधूरे सवालों की याद है।
स्टोरी/संस्मरण: जयप्रकाश उत्तराखंडी
नोट: लेख में व्यक्तिगत घटनाओं और दावों को जयप्रकाश उत्तराखंडी के संस्मरण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।



