मसूरी , PAHAAD NEWS TEAM

आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती है। इस मौके पर मसूरी भाजपा मंडल अध्यक्ष मोहन पेटवाल ने लंढौर स्थित पंडित दीनदयाल पार्क में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की . उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित कर दिया और हमेशा देश को एक सूत्र में पिरोने का काम किया.

पहाड़ों की रानी मसूरी में , बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 105 वीं जयंती पर, भाजपा कार्यकर्ताओं ने लंढौर स्थित पंडित दीनदयाल पार्क में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। इसके साथ ही उन्होंने उनके विचारों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया। इस मौके पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने पंडित दीनदयाल अमर रहे के नारे भी लगाए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा, यूपी में हुआ था।

मसूरी भाजपा मंडल अध्यक्ष मोहन पेटवाल ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित कर दिया और हमेशा देश को एक सूत्र में पिरोने का काम किया. उन्होंने एकात्म मानवतावाद का नारा देकर समाज को जोड़ने का प्रयास किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों में राजनीति की हर समस्या का समाधान था। यह गांव, समाज और राष्ट्र के विकास का दर्शन था। यदि राष्ट्र की दशा और दिशा को बदलना है तो उनके विचारों की रक्षा और प्रचार-प्रसार करना अति आवश्यक है। उनके एकात्म मानवतावाद दर्शन को लोगों तक पहुँचाना होगा।

इस मौके पर महासचिव कुशाल राणा ने कहा कि पंडित दीनदयाल ने हमेशा एकात्म मानवतावाद का नारा दिया. उन्होंने समाज के पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भारत की राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल ने कहा था कि भारत अतीत से एक राष्ट्र रहा है, चाहे वह अंग्रेजों का शासन हो या अब आजादी के बाद भी। उन्होंने कहा कि जो इस धरती पर पैदा हुआ वह भारतीय है, यही उसकी सांस्कृतिक विरासत और संस्कृति है।

इस अवसर पर मसूरी भाजपा के मंडल अध्यक्ष मोहन पटवाल महामंत्री कुशाल सिंह राणा, नगर पालिका में मनोनीत सभासद अरविंद सेमवाल , मनोज खरोला ,अमित भट्ट ,अमित पंवार ,राकेश ठाकुर ,अनिता पुंडीर ,शाहिद आदि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

आइए पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बारे में कुछ और जाने

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को वर्तमान उत्तर प्रदेश की पवित्र ब्रजभूमि में मथुरा के नगला चंद्रभान नामक गाँव में हुआ था। बचपन में एक ज्योतिषी ने उनकी कुंडली देखकर भविष्यवाणी कर दी थी कि आगे चलकर यह बालक बड़ा विद्वान और विचारक, अग्रणी राजनीतिज्ञ और निस्वार्थ सेवा करने वाला व्यक्ति बनेगा, लेकिन वह विवाह नहीं करेगा। बचपन में दीनदयालजी को एक गहरा आघात लगा था जब उनके भाई की 1934 में बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु हो गई थी। उन्होंने अपनी हाई स्कूल की शिक्षा सीकर , वर्तमान राजस्थान में प्राप्त की। पढ़ाई में उत्कृष्ट होने के कारण, सीकर के तत्कालीन राजा ने दीनदयाल को स्वर्ण पदक, पुस्तकों के लिए २५० रुपये और १० रुपये की मासिक छात्रवृत्ति प्रदान की।

दीनदयाल ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पिलानी में विशेष योग्यता से उत्तीर्ण की। इसके बाद वह बी.ए. शिक्षा लेने के लिए कानपुर आए, जहां उन्हें सनातन धर्म कॉलेज में भर्ती कराया गया। अपने एक मित्र श्री बलवंत महाशब्दे की प्रेरणा से वे वर्ष 1937 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए। उसी वर्ष उन्होंने बी.ए. उसने परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद एम.ए. के बाद वह पढ़ाई के लिए आगरा आ गए ।

आगरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेवा के दौरान श्री नानाजी देशमुख और श्री भाउ जुगडे से उनका परिचय हुआ। उसी समय दीनदयालजी की बहन सुश्री रमादेवी बीमार पड़ गईं और अपने इलाज के लिए आगरा आ गईं। लेकिन दुर्भाग्य से वह मर गई। दीनदयालजी के लिए यह उनके जीवन का दूसरा बड़ा झटका था। इस वजह से उन्होंने एम.ए. खो दिया और परीक्षा नहीं दे सके और उनकी छात्रवृत्ति भी समाप्त हो गई।

दीनदयाल जी हमेशा परीक्षा में प्रथम आए, उन्होंने मैट्रिक और इंटरमीडिएट दोनों परीक्षाओं में स्वर्ण पदक प्राप्त किया था, इन परीक्षाओं को पास करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए एसडी करने के लिए एस.डी. कॉलेज, कानपुर में प्रवेश लिया वहॉ उनकी मुलाकात श्री सुन्दरसिंह भण्डारी, बलवंत महासिंघे जैसे कई लोगों से हुआ इन लोंगों से मुलाकात होने के बाद दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे . दीनदयाल जी ने वर्ष 1939 में प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की बी.ए पास करनेे के पश्‍चात दीनदयाल जी एम.ए की पढाई करने के लिए आगरा चले गये लेकिन अपनी चचेरी बहन रमा देवी की मृत्यु के कारण वे एमए की परीक्षा नहीं दे सके।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार:

पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक महान विचारक थे। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगांतरकारी रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानव दर्शन जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के दर्शन पर उत्कृष्ट विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक एकात्म मानववाद में साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों की आलोचना की है। एकात्म मानववाद में मानव जाति की बुनियादी जरूरतों और बनाए गए कानूनों के अनुसार राजनीतिक कार्रवाई के लिए एक वैकल्पिक संदर्भ दिया गया है। दीनदयाल उपाध्याय का मानना है कि हिंदू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति है।

मौत :

पं. दीन दयाल उपाध्याय की 11 फरवरी, 1968 को रहस्यमय तरीके से मृत्यु हो गई थी। मुगलसराय रेलवे यार्ड में उनका शव मिलने के बाद पूरे देश में शौक की लहर दौड़ गई थी। अपने प्रिय नेता के खोने के बाद भारतीय जग संघ के कार्यकर्ता और नेता अनाथ हो गए। पार्टी को इस दुख से उबरने में काफी समय लगा। इस तरह से उनकी हत्या को कई लोग भारत के सबसे बुरे घोटालों में से एक मानते थे। लेकिन सच्चाई यह है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग समाज के लिए हमेशा अमर रहते हैं।