राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर विदेशों में प्रस्तुतियों तक पहुंचाई उत्तराखंड की लोकसंस्कृति

देहरादून। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ीं, अपनी माटी की खुशबू को आवाज में पिरोया और लोकसंस्कृति को दुनिया के मंच तक पहुंचाने का सपना संजोया। यह कहानी उत्तराखंड की दो ऐसी बेटियों की है, जिन्होंने अपनी मेहनत, संघर्ष और साधना से न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को भी नई ऊंचाइयां दीं। लोक गायिका डॉ. रेशमा शाह और लोक जागर गायिका हेमा नेगी करासी का चयन उत्तराखंड गौरव सम्मान–2026 के लिए किया गया है। छह नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर देहरादून के परेड ग्राउंड में दोनों को सम्मानित किया जाएगा।

दोनों कलाकारों को मिलने वाला यह सम्मान उनके वर्षों के संघर्ष, समर्पण और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों की पहचान है। इस उपलब्धि से पत्रकार दीपक कैंतुरा भी खासे उत्साहित हैं। इसकी वजह यह है कि उन्होंने अपने कार्यक्रम ‘रैबार’ में कभी इन दोनों लोक गायिकाओं का साक्षात्कार किया था। दीपक कैंतुरा बताते हैं कि उस बातचीत के दौरान ही उन्हें महसूस हो गया था कि ये दोनों बेटियां अपनी प्रतिभा के दम पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को विश्व पटल तक पहुंचाने की क्षमता रखती हैं। आज दोनों का प्रदेश के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चयनित होना उनके उस विश्वास को और मजबूत करता है।

डॉ. रेशमा शाह: पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच नहीं बुझने दी लोकसंगीत की लौ

टिहरी जनपद के नैनबाग क्षेत्र के सणब गांव से जुड़ी डॉ. रेशमा शाह का संगीत सफर बचपन के शौक से शुरू हुआ। पहाड़ की लोकधुनों और पारंपरिक गीतों से उनका जुड़ाव ऐसा रहा कि वर्ष 1998 में उन्होंने गायकी की शुरुआत करते हुए अपना पहला गीत रिकॉर्ड कराया। शुरुआती दौर में उन्होंने अपनी आवाज के दम पर पहचान बनानी शुरू की, लेकिन जीवन की पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें संगीत की दुनिया से लंबा विराम भी लेना पड़ा।

यह किसी भी कलाकार के लिए आसान दौर नहीं होता, जब वर्षों की मेहनत और सपनों के बीच पारिवारिक जिम्मेदारियां खड़ी हो जाएं। रेशमा शाह के साथ भी ऐसा हुआ, लेकिन लोकसंगीत के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। वर्ष 2009 में उन्होंने एक बार फिर वापसी की और देहरादून में राज्य स्थापना दिवस के कार्यक्रम में प्रस्तुति देकर अपनी नई पारी की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

जौनसार-बावर की लोकसंस्कृति से उनका विशेष जुड़ाव रहा है। उन्होंने जौनसारी, गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनपुरी सहित विभिन्न लोकभाषाओं में सैकड़ों गीत गाए हैं। उनकी गायकी में पहाड़ की परंपराओं, लोकजीवन और सामाजिक सरोकारों की झलक दिखाई देती है।

उनके संगीत सफर की बड़ी उपलब्धि संगीत नाटक अकादमी का प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार है। इसके लिए उन्हें वर्ष 2020 के पुरस्कार चक्र में सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की गई है।

रेशमा शाह का अंतरराष्ट्रीय सफर भी उल्लेखनीय है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, वह अपने लगभग 26 वर्षों के संगीत एवं नृत्य के सफर में 16 से अधिक देशों में उत्तराखंड की संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत और दुबई में प्रस्तुतियां देने के साथ उन्होंने दिसंबर 2023 में दिल्ली और अहमदाबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय लोक महोत्सव में भी उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया। इस आयोजन में तुर्की और पाकिस्तान सहित सात देशों के कलाकार शामिल हुए थे। रेशमा शाह ने वहां उत्तराखंड के तीन लोकगीत प्रस्तुत किए।

उनका मानना है कि अपनी बोली-भाषा और संस्कृति को भूलना नहीं चाहिए। हाल ही में उनके गीत ‘पहाड़ घूमणा’ के माध्यम से भी गांवों से होते पलायन और अपनी जड़ों से दूर होती नई पीढ़ी का दर्द सामने आया। उनका संदेश साफ है कि गांव बचेंगे तो पहाड़ बचेंगे।

हेमा नेगी करासी: चार साल की उम्र में पिता को खोया, मां ने हौसला दिया तो जागरों की आवाज बन गईं

रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि क्षेत्र की दशज्यूला-कांडई पट्टी के टुखिंडा गांव की हेमा नेगी करासी की कहानी संघर्ष और हौसले की ऐसी मिसाल है, जो किसी को भी प्रेरित कर सकती है। छह संतानों वाले परिवार में पली-बढ़ीं हेमा के जीवन में बचपन में ही ऐसा दुख आया, जिसने उनके परिवार की परिस्थितियां बदल दीं। महज चार वर्ष की उम्र में उनके पिता चंद्र सिंह नेगी का निधन हो गया। पिता का साया सिर से उठने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां बची देवी के कंधों पर आ गई।

आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियों के बीच मां ने अपनी बेटी के हुनर को दबने नहीं दिया। बचपन से ही हेमा को जागर, मांगल, झुमैलो, चौफला और पर्यावरण से जुड़े लोकगीतों में रुचि थी। पिता से सुनी लोकगाथाएं उनके मन में बस गई थीं। मां के हौसले और अपने भीतर के जुनून ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।

वर्ष 2003 में राजकीय इंटर कॉलेज कांडई के वार्षिकोत्सव में उन्होंने ‘धरती हमरा गढ़वाल की’ गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में मौजूद आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े लोगों ने उनकी आवाज की सराहना की। यही प्रस्तुति उनके गायन सफर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

इंटरमीडिएट के बाद वह अपनी बड़ी बहन के साथ कोटद्वार चली गईं। वहां स्नातक की पढ़ाई के साथ संगीत की शिक्षा भी जारी रखी और संगीत शिक्षक गिरीश शर्मा से मार्गदर्शन प्राप्त किया। अपने सपनों को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें छोटे-छोटे आयोजनों और कार्यक्रमों से शुरुआत करनी पड़ी। एक दौर ऐसा भी आया जब आजीविका के लिए उन्होंने समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में काम किया। इसके बावजूद संगीत के प्रति उनका समर्पण बना रहा।

वर्ष 2005 में उनकी पहली गढ़वाली ऑडियो एल्बम ‘क्या बुन तब’ रिलीज हुई। इसी वर्ष लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ उनकी एल्बम ‘कथा कार्तिक स्वामी’ भी आई। इससे उन्हें लोकसंगीत की दुनिया में नई पहचान मिली।

वर्ष 2008-09 के आसपास विवाह के बाद भी उनकी संगीत यात्रा में कुछ समय का विराम आया, लेकिन उनके पति अनिल करासी ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। परिवार का सहयोग मिलने के बाद उन्होंने फिर गायकी को गति दी। वर्ष 2011-12 में ‘माई मठियाणा देवी’ और वर्ष 2013 में ‘गिर-गेंदवा’ जैसी प्रस्तुतियों ने उन्हें नई पहचान दिलाई। धीरे-धीरे उनके गीत और जागर उत्तराखंड के घर-घर तक पहुंचने लगे।

आज हेमा नेगी करासी के खाते में 50 से अधिक एल्बम और अनेक लोकप्रिय लोकगीत हैं। आछरी जागर, नागराज जागर, चंडिका भजन, पारंपरिक मांगल गीत और देवी-देवताओं की लोकगाथाओं को उन्होंने अपनी आवाज के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया है।

उनके प्रमुख सम्मानों में वर्ष 2021 का मां नंदा शक्ति सम्मान, वर्ष 2024 का संगीत नाटक अकादमी का उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार, वर्ष 2025 का तीलू रौतेली पुरस्कार और वर्ष 2026 का अमेजिंग इंडिया अवॉर्ड शामिल हैं। अब उत्तराखंड गौरव सम्मान के लिए चयनित होना उनके लंबे सांस्कृतिक सफर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

हेमा नेगी करासी की आवाज न्यूजीलैंड, दुबई, इंग्लैंड और जापान तक पहुंच चुकी है। विदेशों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर उन्होंने प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी माटी, लोकदेवताओं और पारंपरिक गीतों से जोड़ा है। वर्ष 2015 में न्यूजीलैंड में भी उन्हें सम्मानित किया गया था।

दो कहानियां, एक संकल्प: अपनी माटी की पहचान को बचाना

डॉ. रेशमा शाह और हेमा नेगी करासी की जीवन यात्रा में कई समानताएं हैं। दोनों ने पहाड़ की लोकसंस्कृति को अपनी पहचान बनाया। दोनों के सामने जीवन में ऐसे दौर आए, जब परिस्थितियां उनके सपनों के रास्ते में बाधा बन सकती थीं। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी साधना जारी रखी।

रेशमा शाह ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संगीत से दोबारा जुड़कर अपनी पहचान को मजबूत किया, तो हेमा नेगी करासी ने बचपन में पिता को खोने और सीमित संसाधनों के बीच अपनी मां के हौसले से संगीत की दुनिया में मुकाम हासिल किया। एक ने पहाड़ की लोकधुनों को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, तो दूसरी ने जागर और लोकआस्था की सदियों पुरानी परंपरा को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रखा।

रैबार के मंच पर हुआ साक्षात्कार, आज प्रदेश के सम्मान तक पहुंचा सफर

पत्रकार दीपक कैंतुरा कहते हैं कि उनके लिए यह उपलब्धि व्यक्तिगत खुशी का विषय है। उन्हें याद है कि जब उन्होंने अपने कार्यक्रम ‘रैबार’ में इन दोनों कलाकारों को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया था, तभी उन्हें महसूस हुआ था कि इनकी आवाज में केवल संगीत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और अपनी माटी के प्रति गहरा जुड़ाव है।

उनका कहना है कि पत्रकारिता केवल खबर दिखाने और लोगों से बातचीत करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण दायित्व समाज में छिपी प्रतिभाओं को पहचानना, उन्हें मंच देना और उनकी उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाना भी है। ‘रैबार’ के मंच पर इन दोनों कलाकारों से बातचीत करना उनके लिए यादगार अनुभव रहा है।

दीपक कैंतुरा ने कहा कि आज जब दोनों बेटियों को उत्तराखंड गौरव सम्मान के लिए चुना गया है, तो उन्हें उस दिन की बातचीत याद आ रही है। उस समय मन में जो विश्वास था, आज उसे साकार होते देखना बेहद सुखद है। किसी पत्रकार के लिए यह भी बड़ी उपलब्धि है कि उसके कार्यक्रम के मंच पर कभी जिन प्रतिभाओं को स्थान मिला, वे आगे चलकर पूरे प्रदेश का गौरव बनें।

उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल डॉ. रेशमा शाह और हेमा नेगी करासी का सम्मान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकभाषा, लोकसंगीत, लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। आज आवश्यकता है कि प्रदेश की ऐसी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया जाए, लोककलाओं को संरक्षण मिले और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।

डॉ. रेशमा शाह और हेमा नेगी करासी को हार्दिक बधाई। पहाड़ की इन बेटियों ने साबित कर दिया है कि संघर्ष चाहे जितना बड़ा हो, यदि मन में अपनी माटी के लिए कुछ करने का जुनून हो तो आवाज सात समंदर पार तक पहुंच सकती है।