मसूरी   , PAHAAD NEWS TEAM

हर राजनीतिक दल हर चुनाव में कई वादे करता है। इनमें से कितने वादे पूरे हुए और कितने नहीं, यह कहना मुश्किल है। ऐसा कम ही होता है कि कोई पार्टी अपने घोषणापत्र के सभी वादों को पूरा करती हो। इन घोषणाओं, वादों को रोकने की मांग उठती रही है, लेकिन सवाल यह है कि इन्हें कौन रोकेगा?

जैसा कि उत्तराखंड में चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और सभी पार्टियां अपने अपने अलग-अलग दावे कर रही है l सभी राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग वादे कर जनता को अपनी और लुभाने में लगे हुए हैं। मेरा मानना यह है कि जितने भी राजनीतिक पार्टियां है जो कि अपना एक चुनाव घोषणा पत्र तैयार करती है इस बारे में भी एक कानून होना चाहिए जो वादे उन्होंने चुनाव के समय किए उनमें से कितने पूरे हुए और कितने अधूरे हैं इस पर भी एक कानून बनाने की आवश्यकता है ताकि निकट भविष्य में कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसा कोई वादा ना करें जिससे कि समाज को क्षति पहुंचे और वह पूरा ना किया जा सके इससे क्या होगा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी है अनाप-शनाप घोषणा पत्र में अपनी घोषणा नहीं कर सकेंगे और इससे जनता के साथ धोखा होने से भी बचा जा सकता है l
मैं चुनाव आयोग से इस बारे में अनुरोध करूंगा कि सभी पार्टियों के घोषणा पत्र को एक कानून के रूप में बनाने का काम किया जाए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण होगा जिससे कि सभी राजनीतिक पार्टियां अपना जो चुनाव का घोषणा पत्र है उसको बनाने में संयम बरतें की और जो पार्टी चुनाव जीत जाती है उसकी यह जिम्मेदारी भी होगी कि जो उन्होंने चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्र में घोषणाएं की हैं उनको पूरा किया जाए अगर वह उसमें से सारी घोषणाएं पूर्ण नहीं की कर सकते तो उनको अब आने वाले चुनाव में चुनाव ना लड़ने दिया जाए l

चुनावी घोषणाओं को रोकना न तो चुनाव आयोग के हाथ में है और न ही अदालतों के हाथ में है। क्योंकि संविधान में राजनीतिक दलों की घोषणाओं को रोकने का कोई जिक्र नहीं है। दरअसल, राजनीतिक दल इसका फायदा उठाते हैं और चुनाव में ऐसी घोषणाएं करते हैं, जिन्हें किसी भी हालत में पूरा करना संभव नहीं है. राजनीतिक दलों को यह भी पता है कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो उनके लिए अपनी घोषणाओं को पूरा करना संभव नहीं है। यह बात राजनीतिक दलों को भी पता है कि वे अगर सत्ता में आ जाएं तो अपनी घोषणाओं को पूरा कर पाना उनके लिए भी संभव नहीं। लेकिन जितना ढिंढोरा पीटते हुए घोषणाएं की जाती हैं, न चाहते हुए भी लोगों को उन पर विश्वास हो जाता है । सच तो यह है कि उस शोर-शराबे के बीच लोग यह समझने की कोशिश तक नहीं करते कि क्या संभव है और क्या नहीं। भ्रम का जाल बिछाया है। हर कोई इसी भ्रम के जाल में फंस जाता है। अंत में, लोग उन वादों पर ठगा हुआ महसूस करते हैं जो काम नहीं करते हैं।

जनता के साथ यह विश्वासघात राजनीतिक दल नहीं कर सकें, इसलिए हर चुनाव में उनके घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज मानने की मांग उठती है। ऐसा चुनाव आयोग भी कहता रहा है. ऐसा ही एक प्रस्ताव 2017 में आया था। तब हमने यह प्रस्ताव चुनाव आयोग को भेजा था। संभवत: आयोग ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भी भेजा था। दरअसल, राजनीतिक दलों के घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज बनाने के लिए सबसे पहले संसद में कानून बनाना पड़ता है। केवल संसद ही कानून बना सकती है। चुनाव आयोग या अदालत नहीं। चुनाव आयोग या देश का सर्वोच्च न्यायालय देख सकता है कि कानून का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। लेकिन क्या गलत है और क्या सही, ये तो कानून बनने के बाद ही पता चलेगा. जब तक केंद्र सरकार घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज मानने के लिए कानून नहीं बनाती, तब तक इन घोषणाओं को रोका नहीं जा सकता। क्या यह पार्टियों की इच्छा पर निर्भर है? दरअसल, कई राजनीतिक दल यह भी जानते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो उनकी राजनीति को खतरा होगा.

घोषणा पत्र में कानून बन जाता है तो उससे विकास की रफ्तार बढ़ेगी और कोई भी राजनीतिक पार्टियां जनता से झूठे वादे नहीं कर सकते अगर झूठे वादे करती भी है तो आने वाले चुनाव में उनको चुनाव ना लड़ने दिया जाए

हमारे सहयोगी वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र रावत ने इस बारे में अपनी राय रखी उन्होंने कहा है की घोषणा पत्र में किसी भी हाल पर कानून बनना चाहिए इससे जनता का भला होगा और राजनीतिक पार्टियां भी अपने चुनाव घोषणा पत्र बनाने में सतर्कता बरतेगी।