केम्पटी फॉल्स मसूरी , PAHAAD NEWS TEAM
समाज सेवी संजय सिंह ने आज बहुत बढ़िया बात फेसबुक पर शेयर की है यह चुनाव का समय है, यह कोई नया नहीं है, यह जल्द ही फिर से आएगा, कृपया अभी कोई ऐसी बात न करे , ऐसा कोई संदेश न दें कि 10 मार्च के बाद लोग आपको याद दिलाने के लिए वापस भेजकर आपका अपमान करते रहें। ये हमें कतई पसंद नहीं आएगा, फिर आप कैसे…. हम सभी का कोई न कोई ऐसा चहेता होता है जो इस दौर की राजनीति में सक्रिय होता है , किसी चहेते को टिकट नहीं मिला, किसी को मिला, तो किसी को दुखी करने या खुश होने की कोई जरूरत नहीं है. . जो जीतेगा वो अगले 5 साल तक हमारा नेतृत्व करेगा, आप माने या ना माने तो कुछ नहीं होगा।
समाज सेवी संजय सिंह ने आज ये भी कहाँ मेरा अनुभव कम है, हमने भी कुछ नेताओं को पकड़ा है, आप में से बहुत से लोग यह सब करते-करते थक गए होंगे, जिन नेताओं को हमने पकड़ा वो कल वहाँ थे आज यहाँ हैं, और कल कहाँ होंगे ।आपको तो क्या उनको भी नहीं पता। हम ही चक्कर घिन्नी बने हैं- अपनी ही वजह से बने हैं। कि आप उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। आपका प्यार एक तरफा है। पता नहीं वो क्या सोचते हैं, क्या आपने कभी जानने की कोशिश की है? क्योंकि जब उनकी धारा अलग हो जाती है तो हम उन्हें श्राप देते हैं। लेकिन उनकी दृष्टि क्लेयर है। जहां एक ‘अवसर मिला , वहां दिल मिला ।’
नेता से
दलगत राजनीति करने वाले भाइयो, एक बात समझ लेनी चाहिए कि इस पार्टी में रहकर कम से कम उस पार्टी को कोसना नहीं चाहिए, क्या पता यहाँ आपको सालों बाद घुटन महसूस होने लगे , क्या आप जानते हैं कि आपकी पार्टी में भी? कोई नई बहू की तरह आये जो आकर सास के जमे हुए परिवार को तोड़ देती है, तो आपकी अगली मंजिल वही होनी चाहिए। इस पार्टी में शामिल होते हुए कुछ देर रुकिए और सोचिए – क्या आप जानते हैं कि अगर आपको वहां जाना है और अगले ही दिन घर लौटना है, तो बस इतना ही कहें कि जब आप यहां से वहां होंगे – यहां से वहां, होने पर आपको लोग फिर से आपके विडिओ, ऑडिओ दिखा-दिखा कर, याद दिला-दिला कर -.
वैसे भी हमारी ज्यादातर हैसियत सिर्फ इतनी है कि मैं इस पार्टी के समर्थन में सिर्फ इसलिए हूं क्योंकि मेरे पास उस पार्टी में वह पड़ोसी है जिसके साथ मेरा रास्ते का झगड़ा है, वह उस पार्टी में है क्योंकि वह मेरे लेन-देन में खराब हो गया है । तीसरा किसी भी पार्टी में है क्योंकि दोनों पार्टियों में उसकी कोई जगह नहीं है, कोई वैचारिक लड़ाई नहीं है। लड़ाई ही लड़ाई है। यह हमारी एकमात्र राजनीतिक स्थिति है।
बहुत कम लोग हैं जो सिद्धांतों की लड़ाई लड़ रहे हैं और हमारी लड़ाई में उनका कोई दर्जा नहीं है।

