देहरादून: केंद्र सरकार की हरी झंडी के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने मानसिक स्वास्थ्य नियमावली को मंजूरी दे दी. जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग के खाते में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है. स्वास्थ्य विभाग की कमान संभालने के बाद मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने इस पर गंभीरता से काम किया. उन्होंने इसके लिए केंद्र में कई बार पैरवी की। स्वास्थ्य सचिव डॉ आर राजेश कुमार ने पूरी टीम के साथ लगन से काम किया और केंद्र से मंजूरी के बाद राज्य कैबिनेट ने भी इसे मंजूरी दे दी.

आपको बता दें कि स्वास्थ्य सचिव बनने के बाद डॉ आर राजेश कुमार राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने और केंद्र की योजनाओं को तेजी से राज्य में जमीन पर उतारने में सफल रहे हैं. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ समय-समय पर दौरे पर आए केन्द्र सरकार के अधिकारियों ने भी राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं और केन्द्रीय स्वास्थ्य योजनाओं की प्रगति की सराहना की है।

स्वास्थ्य सचिव डॉ आर राजेश कुमार ने इस उपलब्धि के लिए महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ विनीता शाह सहित पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य नियम बनाने से पहले इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्य से जुड़े लोगों की राय ली गयी थी. जिसके बाद उनके फाइनल ड्राफ्ट पर मुहर लग गई.

स्वास्थ्य सचिव डॉ आर राजेश कुमार ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य नियमावली को मंजूरी मिलने के बाद राज्य में मनोचिकित्सकों, नर्सों, मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं को नशामुक्ति केंद्रों, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में निबंधन कराना अनिवार्य होगा. लेकिन मनोचिकित्सकों से रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं लिया जाएगा. केंद्र सरकार ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम लागू किया। इसके साथ ही राज्यों को इस अधिनियम के तहत मानसिक स्वास्थ्य नीतियां और नियम बनाने का भी निर्देश दिया गया।अधिनियम के तहत 2019 में सरकार ने राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण का गठन किया। लेकिन नियमावली न होने के कारण प्राधिकरण काम नहीं कर पा रहा था। बीते माह स्वास्थ्य विभाग की ओर से नियमावली का प्रस्ताव केंद्र सरकार की अनुमति के लिए भेजा गया था। केंद्र सरकार ने नियमावली का परीक्षण करने के बाद मंजूरी दे दी है। शुक्रवार को कैबिनेट में इस नियमावली को मंजूरी मिल गई।

मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को पंजीकरण शुल्क देना होगा
राज्य में संचालित नशामुक्ति केंद्रों या मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को प्राधिकरण के साथ अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा। इसके लिए शुल्क भी लिया जाएगा. एक साल के अस्थायी लाइसेंस के लिए 2,000 रुपये का शुल्क लगेगा। इसके बाद स्थायी रजिस्ट्रेशन के लिए 20 हजार का शुल्क देना होगा.

इन नियमों का भी करना होगा पालन
नशा मुक्ति केंद्र मानसिक को एक कमरे में बंधक नहीं बना सकते। मरीज को नशा मुक्ति केंद्रों में भर्ती कराया जाएगा और डॉक्टर की सलाह पर छुट्टी दे दी जाएगी। सेंटर में फीस, रहना, भोजन का मेन्यू प्रदर्शित करना होगा। मरीजों के इलाज के लिए मनोचिकित्सक, डॉक्टर को नियुक्त करना होगा. केंद्र में मनोरोगियों के लिए खुली जगह होनी चाहिए। जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड द्वारा निगरानी की जायेगी.मानसिक रोगी को अपने परिजनों से बात करने के लिए फोन की सुविधा उपलब्ध करायी जायेगी. इसके अलावा कमरे में एक बेड से दूसरे बेड की दूरी भी तय की गई है.

13 जनपदों के 07 स्थानों पर पुनर्विलोकन बोर्डों का गठन
मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम-2017 को भारत सरकार द्वारा दिनांक 29 मई, 2018 को अधिसूचित कर दिया गया था, जिसको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा मूल रूप में अधिकृत कर लिया गया है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों, उनके उचित उपचार एवं संरक्षण करना है। इस अधिनियम के अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण एवं उत्तराखण्ड के 13 जनपदों के 07 स्थानों पर पुनर्विलोकन बोर्डों का गठन कर दिया गया है। इनमें हरिद्वार जनपद में एक, देहरादून जनपद में एक, उधमसिंह नगर जनपद के रूद्रपुर में एक, पौड़ी गढ़वाल, रूद्रप्रयाग, और चमोली जनपद का सेंटर श्रीगर गढ़वाल में, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी जनपद का न्यू टिहरी में और बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत जनपद का पिथौरागढ में बोर्ड का गठन किया गया है।

सभी मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों (नशा मुक्ति केंद्रों सहित) को मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों (नैदानिक ​​​​मनोवैज्ञानिक, मानसिक स्वास्थ्य नर्स और मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता) को राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण कार्यालय में पंजीकृत होने की आवश्यकता होती है। मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के अस्थायी पंजीकरण के लिए न्यूनतम रु. 2,000/- और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का पंजीकरण निःशुल्क किया जाना है।

नियमों का उल्लंघन करने पर 2 साल की जेल या 50 हजार जुर्माना
नियमावली में नियमों का उल्लंघन करने पर मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों ( नशामुक्ति केन्द्रों सहित) द्वारा प्रथम उल्लघन पर 5,000/- से 50,000/- रूपये, दूसरे उल्लघन पर 2,00,000/- रूपये व बार-बार उल्लघन पर 5,00,000/- रूपये का जुर्माना दण्ड के रूप में प्राविधान है। ऐसे मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (नशामुक्ति केन्द्रों सहित) जो पंजीकृत नहीं है, में कार्य करने वाले मानसिक स्वास्थ्य वृत्तिकों पर 25,000/- रूपये तक जुर्माना दण्ड के रूप में प्राविधान है।

यदि कोई व्यक्ति अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों या विनियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो ऐसे मामले में ऐसे व्यक्ति को छह महीने तक की कैद या रुपये का जुर्माना हो सकता है। 10,000/- जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है। पहली बार अपराध करने पर या दोनों के लिए कारावास और दोबारा अपराध करने पर दो साल तक का कारावास या 50,000/- रुपये से 5,00,000/- रुपये तक जुर्माना या दोनों।

इन नियम-कायदों के लागू होने से राज्य में मानसिक रोग से पीड़ित लोगों को उच्च गुणवत्ता का उचित इलाज मिल सकेगा और अवैध संस्थानों पर अंकुश लगेगा। भारत सरकार एवं राज्य सरकार इस क्षेत्र में कार्य करने हेतु प्रतिबद्ध हैं।

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