उत्तराखंड अपने तीज-त्योहारों, लोक परंपराओं और लोक उत्सवों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां मनाए जाने वाले लोक उत्सवों में प्रकृति के प्रति अनोखा प्रेम देखने को मिलता है। हरेला महोत्सव (हरेला 2023) एक ऐसा त्यौहार है जो प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है। उत्तराखंड के लोक त्योहारों में से एक हरेला को गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। वैसे तो हरेला साल में तीन बार मनाया जाता है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हरेला त्यौहार सावन महीने के पहले दिन मनाया जाता है। लोक परंपराओं के अनुसार पहले के समय में पर्वतीय क्षेत्र के लोग कृषि पर निर्भर थे। इसीलिए सावन माह के आगमन से पहले किसान भगवान और प्रकृति मां से अच्छी फसल और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डी.आर. पुरोहित का कहना है कि हरेला को सावन के पहले संक्राद के रूप में मनाया जाता है. कुमाऊं में इसे हरियाली और गढ़वाल क्षेत्र में मोल सांक्राद के नाम से जाना जाता है। इस दौरान धान के खेतों में मोलू के पेड़ लगाए गए, ताकि खेत में कीड़े न लगे।

हरेला पर्व पर पौधे रोपे जाते हैं
प्रोफेसर पुरोहित ने कहा कि हरेला की परंपरा बहुत पुरानी है. बदलते समय के साथ पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ इसे पूरे राज्य में एक लोक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। ये तो वही बात है कि महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला ‘गणेशोत्सव’ एक छोटा सा उत्सव था और आज ये देशव्यापी हो गया है. उसी प्रकार हरेला उत्सव भी आज राज्य स्तरीय बन गया है। इस दिन अन्य स्थानों पर भी पौधे लगाए जाते हैं।
पहाड़ों में हरेला पर्व के बाद सावन की शुरुआत होती है
मैदानी इलाकों में सावन 4 जुलाई से शुरू हो जाता है, लेकिन उत्तराखंड में हरेला पर्व को सावन माह की शुरुआत माना जाता है। पहाड़ों में 17 जुलाई से सावन शुरू हो जाएगा। सावन के महीने में हरेला त्यौहार का विशेष महत्व है, क्योंकि सावन भगवान शिव का सबसे पसंदीदा महीना है। उत्तराखंड को भगवान शिव की भूमि भी कहा जाता है।
ऐसा माना जाता है कि घर में बोया जाने वाला हरेला जितना बड़ा होगा, पहाड़ के लोगों को खेती में उतना ही फायदा होगा। कई स्थानों पर हरेला सामूहिक रूप से ग्राम पंचायत के पंडाल में या स्थानीय देवता के मंदिर में लगाया जाता है और कुछ स्थानों पर हरेला घर-घर में भी लगाया जाता है।
हरेला कैसे बोया जाता है?
इसे हरेला पर्व से 9 दिन पहले लगाया जाता है। इसकी बुआई के लिए साफ मिट्टी का उपयोग किया जाता है. सबसे पहले मिट्टी को घर के पास किसी साफ जगह से निकालकर सुखाया जाता है और फिर छानकर एक टोकरी में जमा कर लिया जाता है। इसके बाद 5 या 7 अनाज जैसे- मक्का, धान, तिल, भट्ट, जौ, उड़द और गहत डालकर इसे सींचा जाता है । हरेला को घर या मंदिर में भी लगाया जाता है।इसे घर में मंदिर के पास रखकर पूरे 9 दिनों तक इसकी देखभाल की जाती है और फिर 10वें दिन इसे काटकर अच्छी फसल की कामना के साथ देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है।


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