हाथों की कलाकारी का हुनर ऐसा, मानों किसी मूर्ति को जीवंत रूप दे दिया हो। पूरी शिद्दत से अपनी कला से मूर्ति तराशने वाले इन हाथों की कलाकारी देख सभी हैरान रह जाते हैं। मिट्टी और सीमेंट से आकार देकर जो मूर्तियां तैयार होती है तो मानों सजीव हों और महज उनमें प्राण डालने बाकी हों और बोल पडें। जी हां,ये वो कलाकार है जिनके पास हुनर तो है पर उस हुनर के कदरदान नहीं। यही वजह है कि आज यह कला विलुप्त होती जा रही है, और जिन मूर्तिकारों ने इस कला को जीवित रखा है वो भुखमरी की कगार पर हैं।
वॉलपेपर, पेंटिंग और आर्टिफिशियल मशीनों से निर्मित मूर्तियों के दौर में हाथों से बनी मूर्तियों की डिमांड नाम मात्र ही रह गयी है। ऐसे में हाथों से बनी मूर्ति के कद्रदान भी कम ही मिलते हैं। इस कला से जुड़े लोग आज भी अपनी कला को जीवित रख कर अपना भरण पोषण कर रहे हैं, लेकिन इन मूर्तिकारों को इनकी कला का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता है, जिससे इस कला से जुड़े लोग आय के नये साधनों की ओर जाने लगे है। जिस वजह से यह कला खत्म होती जा रही है, जबकि हाथों से मूर्ति तराश कर साकार रूप देने वाले इन लोगों की कलाकारी को देख यही लगता है मानों सचेत ही किसी को सामने खडा कर दिया हो। लेकिन इस काश्तकारी से जुडे लोग अब धीरे-धीरे इस कला से मुंह फेरने लगे हैं, क्योंकि उनकी मेहनत का पूरा दाम भी उन्हें नहीं मिल पाता है, जिससे परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल हो गया है।
मूर्तिकारों का कारीगरी, लोगों की अनदेखी

