By: जयप्रकाश उत्तराखंडी
देहरादून शहर में गरीब आदमी के सस्ते खाने का पुराना ठेली कल्चर धीरे धीरे शासन, तथाकथित राजधानी और शहरीकरण ने लगभग खत्म कर दिया है। देहरादून में सस्ते,लजीज और वैरायटी वाले खाने का सड़क किनारे थडा या ठेली संस्कृति 1947 में देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से आया पंजाबी शरणार्थी लाया था।शहर भर में गरीब आदमी इफरात में सस्ते में खाना खाता था।
देहरादून की पहचान थी-सड़क या चौराहे पर पीपल का विशालकाय पेड..कहीं कहीं बगल में बहती नहर..उसके आसपास चार पांच खाने और चाय की ठेलियां..ताजी बनती चपाती,पराठों और नान की उड़ती खूशबू..गरीब आदमी सस्ते में पेट भरता था।
देहरादून को मैंने बचपन से देखा था।
1958-59 में जब मैं जाड़ों की छुट्टियों में झंडा मौहल्ला में अपनी बडी बुआ सुरती देवी शर्मा के घर जाता था।मेरे फूफा स्व प्रेमचंद शर्मा के अंग्रेजी जमाने से आजादी के बाद तक देहरादून से लाहौर तक दो ट्रक चला करते थे।।उनका घर 18 वीं सदी का पुराना रियायशी दो मंजिला टाईप हवेली में था,जिसके बाहर गेट था, जहां मेरी याद में चाट व तंबाकू वाले बैठते थे। झंडा मौहल्ला में सड़क पर खाने की ठेलियां थी। ठकुराइन नाम से मशहूर मेरी एक और छोटी बुआ तारा देवी का भी 1969 से यमुना कालोनी, देहरादून में खाने का रेस्टोरेंट ही था।
1973 में मैंने सनातन धर्म इंटर कालेज(बन्नू), रेसकोर्स देहरादून से इंटर किया, मैं पल्टन बाजार में नहरवाली गली के पास पुरानी सब्जी मंडी के पास एक कमरे में रहता था,जो मेरे स्व पिता के दोस्त और उस दौर के एक बड़े ज्वेलर्स ने मुझे यह कमरा स्कूली पढ़ाई के लिए दिया हुआ था,जो शायद आज भी है।मुझे याद है मैं सब्जी मंडी के पास तीन चार ठेलियों व हलवाईयों के थडे पर 1 रूपये में भरपेट पूड़ी सब्जी खाता था,अचार रायता साथ मिलता था।
1980-88 में जब मैं देहरादून प्रवास में था और शुरू में एक हिंदी अंग्रेजी दैनिक वैनगार्ड में काम करता था तो कैपरी सिनेमा,जो बंद हो गया, वहां रामलाल की ठेली पर दिन में खाना खाता था।खाने से पहले देशी दारू का पव्वा मैं प्याज चटनी में निपटा लेता था।मतलब कि देहरादून में राजधानी बनने से पहले गरीब के लिए सस्ते और सुस्वादु खाने की भरपूर व्यवस्था थी।राजधानी बनने के बाद देहरादून के दैत्याकार शहरीकरण ने शहर भर में पेड़,चौराहे,नहरें नष्ट कर दिए और थडे तोड डाले गये।हजारों खाने की ठेलियां गायब हो गयी,गरीब से सस्ता खाना छीन लिया गया।
देहरादून में टिड्डी दल की तरह आये बाहरी राज्यों के अमीर, मध्य वर्ग और लेबर क्लास ने दून घाटी का मूल चरित्र ही नष्ट कर दिया।अब खाने की ठेलियों की जगह बड़े बड़े माल, रेस्तरां और चिकन शाप खुल गये हैं।अब देहरादून में खाने का धंधा करने वाले पुराने पंजाबी,बनिया हलवाई और कठमाली लगभग गायब से हो गये हैं,अगर हैं भी तो वे दिखते कम हैं।
नीचे से टिड्डी दल की तरह आये अमीर और मध्य वर्ग के लिए महंगे और बड़े रेस्टोरेंट माल्स खुल गये और दून के गरीब से सुनियोजित सस्ता और लजीज खाना छीन लिया गया… ताज्जुब कि इतना बड़ा डेमोग्राफिक परिवर्तन इस सरकार को दिखाई नहीं दे रहा,दुखद है कि दून घाटी में एक भव्य फूड संस्कृति का अंत की ओर है।


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