अहमदाबाद: 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाने वाले आरोपी को गुजरात हाई कोर्ट ने 15 दिन की पैरोल दे दी है. आरोपी हसन अहमद चरखा उर्फ लालू ने पैरोल के लिए आवेदन किया था, जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया. पूरी सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति निशा एम ठाकोर ने कहा कि सजा का निलंबन, पैरोल और जमानत अलग-अलग विषय हैं. दरअसल, 2002 गोधरा दंगे के आरोपी हसन ने अपनी भतीजी की शादी में शामिल होने के लिए पैरोल की अर्जी दी थी।
हाई कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली है. हसन के वकील एम एस भड़की ने हाई कोर्ट को बताया कि जेल में उसका आचरण रिकॉर्ड बहुत अच्छा है. उन्हें पहले ही पैरोल मिल चुकी है.
सरकार का विरोध: पैरोल आवेदन का राज्य सरकार ने विरोध किया था. राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जब आरोपी ने उम्रकैद की सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है तो ऐसी स्थिति में उसे पैरोल नहीं दी जा सकती. राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि जब तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब तक गुजरात हाई कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस निशा एम ठाकोर ने पूर्ण सुनवाई के बाद कहा कि सजा, पैरोल और जमानत अलग-अलग विषय हैं। उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित अपील कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करता है। हाई कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है.इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को पैरोल की इजाजत मांगने वाली याचिकाओं की जांच करने की शक्ति है.
क्या है पूरा मामला: साल 2002 में गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगा दी गई थी. जिसमें 59 कार सेवक हिंदुआ की मृत्यु हो गई। जिसके बाद पूरे राज्य में दंगे भड़क उठे. आरोपी के खिलाफ पंचमहल गोधरा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई और पूरे मामले की सुनवाई गोधरा कोर्ट में हुई जिसमें आरोपी हसन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन वहां भी उसकी सजा बरकरार रखी गई.
विशेष अनुमति याचिका: आरोपी हसन ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की लेकिन याचिका अभी भी लंबित है। हसन ने जमानत के लिए भी आवेदन किया था. जिस पर फैसला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.


Recent Comments