उत्तरकाशी: उत्तरकाशी का सीमावर्ती जिला अपनी संस्कृति के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। जिले के भंडारस्यूं क्षेत्र में डांडा नागराज का मंदिर बन रहा है। मंदिर के निर्माण में ग्रामीणों के घरों की दाल का उपयोग किया जाता है। देवडोली के आदेश पर मंदिर निर्माण में सीमेंट व बालू-बजरी का उपयोग नहीं किया जा रहा है। ग्रामीण मंदिर के लिए उड़द की दाल दान कर रहे हैं।
जिले की गंगा-यमुना घाटी अपनी भवन निर्माण शैली के लिए जानी जाती है। पंचपुरा सहित ढैपुरा शैली के घर ज्यादातर यहां के गांवों में बने हैं। इन भवनों में मवेशियों सहित पूरा संयुक्त परिवार समाया करता था, लेकिन आज के भौतिकवाद में पहाड़ी भवन निर्माण शैली लुप्त होती जा रही है। लुप्त होती भवन शैली और निर्माण सामग्री को बचाने के लिए जुणगा-भंडारस्यूं के ग्रामीणों ने एक नई शुरुआत की है।
10 से 11 गांव के ग्रामीण सहयोग कर रहे हैं
लगभग 10 से 11 गांवों के ग्रामीणों के सहयोग से क्षेत्र के दशगी और भंडारस्यूंय पट्टी में स्थित देवलडांडा में डांडा नागराज देवता का मंदिर बनाया जा रहा है। मंदिर का निर्माण हिमाचल, बागान और सहारनपुर के कारीगरों द्वारा किया जा रहा है। निर्माण कार्य में सात लोग लगे हैं, जो एक साल में मंदिर का काम पूरा कर लेंगे।
डांडा नागराज मंदिर समिति के अध्यक्ष विजेन सिंह कुमाई ने कहा कि देवता के देवता ने आदेश दिया था कि उनके मंदिर के निर्माण में सीमेंट और रेत बजरी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इसकी जगह उड़द (काली दाल) का प्रयोग किया जाए, जिसके लिए ग्रामीण घर से उड़द की दाल पीसकर मंदिर समिति को दे रहे हैं।
जिला पंचायत सदस्य शशी कुमांई का कहना है कि नागराज देवता के आदेश से यह अनूठा प्रयास है। यह तकनीक हमारी समृद्ध स्थापत्य विरासत के संरक्षण में मील का पत्थर साबित होगी। वरिष्ठ पत्रकार सूरत सिंह रावत का कहना है कि टिहरी साम्राज्य के दौरान पहाड़ी में उड़द की दाल का इस्तेमाल इमारतों के निर्माण के लिए किया जाता था।


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