मुजफ्फरनगर
1994 सितम्बर मध्य में मैं और मसूरी के कुछ उत्तराखंड आंदोलनकारी बरेली सेंट्रल जेल से रिहा हुए, मैं दो साथियों के साथ पुलिस की बेदर्द पिटाई के बाद घायलावस्था में इस आशय से दिल्ली निकल गया कि अब देश की राजधानी में राज्य आंदोलन को तेज करेंगे। जेब में धेला पैसा कुछ न था, मेरी पैंट फट चुकी थी। कपडों से दुर्गंध आ रही थी। दिल्ली में उत्तराखंड आंदोलनकारी व पूर्व राज्यमंत्री धीरेन्द्र भाई( धीरेन्द्र प्रताप) ने मदद की और मेरे रहने की व्यवस्था पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व चौधरी अजीत सिंह जी के बंगलानुमा कार्यालय 15 विण्डसर पैलेस पर करवा दी।खाना ढाबों पर चलने लगा, एक साथी ने दो सौ रूपये दिए तो क्नाट प्लेस के फुटपाती बाजार से पेंट खरीद ली। दिनभर हम कुछ साथी दिल्ली में जंतर मंतर पर धरने पर बैठते या राष्ट्रीय मानवाधिकार दफ्तर से लेकर मीडिया दफ्तर के चक्कर लगाते। खाने के लाले थे, उधर पुलिस मार से मेरी लेट्रीन में खून की बूंद टपकना बंद नहीं हो रही थी। 25 सितम्बर 1994 को मैं पैसे कपडे जुटाने के मकसद से अपने घर(मसूरी) लौट आया।मसूरी में पुलिस के हत्थे चढने के पक्के चांस थे , उन दिनों यूपी पुलिस पूरे शैतान का अवतार धारण किए थी, उत्तराखंड आंदोलन के हम जैसे चर्चित चेहरों को कुत्ते की तरह सूंघ रही थी, पीटना और जान से मारने से लेकर जेल यातनायें उन दिनों आम थी। मुझे सूत्रों से ज्ञात हुआ कि पुलिस मुझे पीडब्ल्यूडी इंजीनियर की गाडी छीनने के एक केस में खोज रही है। मैं आधी रात को थैले में कपडे डाल कुछ साथियों से पैसे मांगकर मसूरी से किसी तरह कालसी आया और वहाँ से बस पकड कर हरिद्वार पहुंचा।हरिद्वार से रात 10 बजे दिल्ली की बस में सवार हुआ। 30 सितम्बर 1994 को दिल्ली जाते हुए मैंने देखा मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिस पहाड के यात्रियों की सख्ती से छानबीन कर रही है, मैंने बाल बिखराये,पंखी ओडी और बीमारी का बहाना कर सीट पर लेट गया। पुलिस वाले ने लठठ की नोक अडाकर गाली गलोच के साथ पूछताछ कर छोड दिया। एक अक्टूबर की सुबह मैं दिल्ली पहुंचा। दिल्ली में 2 अक्टूबर (1994) की उत्तराखंड रैली की जबरदस्त तैयारी चल रही थी। उस रात मैं कुछ साथियों के साथ 15 विण्डसर पैलेस में सोया था, सुबह छ बजे धीरेन्द्र प्रताप भाई, साथी खुल्बे ने मुझे जगाया, वह घबराते बोले मुजफ्फरनगर में पहाड से रैली के लिए आ रहे राज्य आंदोलनकारियों की बसों पर फायरिंग हुई है। उन दिनों संचार व्यवस्था के नामपर ज्यादा कुछ था नहीं, खबरें उडती उडती आ रही थी। दिल्ली की उत्तराखंड रैली को असफल बनाने के लिए यूपी की मुलायमसिंह सरकार से ज्यादा दिल्ली प्रदेश की मदनलाल खुराना की भाजपा सरकार सक्रिय थी, दिल्ली की भाजपा सरकार ने प्लेग फैलने के नामपर ज्यादा खौफ फैलाया ताकि हमारी दिल्ली रैली फैल हो। पहली बार मुंह पर मास्क लगाने का ड्रामा दिल्ली की तत्कालिन भाजपा सरकार ने शुरू किया था।संसद भवन पर प्रदर्शन रोक कर प्रशासन ने दिल्ली के बौराडी मैदान में रेली की इजाजत दी। जैसे तैसे रैली हुई। दिन तक रामपुर तिराहा(मुजफ्फरनगर) के बर्बर कांड की खबरे दिल्ली आने लगी थी। गोलीकांड में अनेक आंदोलनकारी मारे गये थे और पहाड की आंदोलनकारी बहनों के साथ गन्ने के खेतों में पुलिस द्वारा घिनोने रुप से बलात्कार किया गया था। देश ने राष्टपिता गांधी की जयंती पर अहिंसक आंदोलनकारी ताकतों पर अंग्रेज मुगल राज से ज्यादा और घिनोना अत्याचार देश दुनिया ने आजाद भारत में देखा था। आज 29 साल हो गये मुजफ्फरनगर कांड के खलनायक अफसर और बलात्कारी पुलिस को आज तक सजा के नामपर फूल की छड से तक नहीं छुआ गया। उत्तराखंड के लिए लडने, अपनी जान खोने वाले और बलात्कार का दंश झेलने वाली बहनों को उत्तराखंड निर्माण के 23 सालों में भाजपा कांग्रेस की प्रदेश सरकारों ने सिवाय अपमानित करने के और कुछ नहीं किया… आज सोचकर हम शर्मिंदा रहते हैं कि क्या हमने यूपी, हरियाणा और मैदान के माफियाओं की चाकरी और सेवा करने वाले इन सत्ताधीशों के लिए इतने बलिदान दिए थे…?

