मसूरी : मसूरी शहीद स्थल की सीढ़ियों के किनारे जहां सैलानियों का आना-जाना लगा रहता है, ऐसे में अशांति के बावजूद एक बच्चा धूप में अपना ध्यान एकाग्र कर पढ़ाई में लगा हुआ नजर आया. उसे नहीं पता कि उसके आसपास क्या हो रहा है।
ऐसे गुदड़ी के लाल को देखकर मुझे पता चला कि कैमल्स बैक रोड पर वह जिस जगह रहता है, वहां धूप नहीं पड़ती और कड़ाके की ठंड में वह पढ़ नहीं सकता, इसलिए वह यहां धूप में पढ़ने आया है।
बच्चे से बात की तो उसने अपना नाम दिलीप चमोली बताया जो द मसूरी गर्ल्स एंड ब्वाइज स्कूल, मसूरी का छठी कक्षा का छात्र है, जो अपने मामा के साथ पहाड़ से अपना गांव छोड़कर यहां पढ़ने के लिए मसूरी आया है. और मामा के साथ रहता है बच्चे दिलीप ने बताया कि उसके पिता सुरेंद्र चमोली दिल्ली में काम करते हैं और मां चंदा चमोली गांव में रहती है। उसने बताया कि वह कैमल्स बैक रोड में रहता है लेकिन वहां धूप नहीं आती और ठंड बहुत है इसलिए वह यहां आकर अपनी पढ़ाई और होमवर्क कर रहा है।
हैरानी की बात है कि इतने शोरगुल भरे माहौल में भी वह एकाग्रता से पढ़ाई करता रहा, जबकि लगातार पर्यटकों का हल्ला और हंगामा होता रहा, कोई और कार्यक्रम चल रहा था, लेकिन उसका ध्यान किसी पर नहीं गया। क्या हो रहा है और वह पढ़ाई में लगा हुआ था। यह पहाड़ की पीड़ा को दर्शाता है, अगर गांव में स्कूल होता तो वह अपनी मां को छोड़कर मसूरी क्यों आता। यह उत्तराखंड राज्य की खोखली शिक्षा नीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पढ़ाई के प्रति उस बच्चे की लगन और एकाग्रता देखकर लगा कि भविष्य में वह अपने माता-पिता का नाम जरूर रोशन करेगा।

