देहरादून: उत्तराखंड का लोकायुक्त कार्यालय देश का पहला ऐसा कार्यालय हो सकता है जो बिना काम के चल रहा है. कार्यालय ही नहीं चल रहा है, सालाना करीब दो करोड़ रुपये वेतन आदि पर भी खर्च हो रहा है. जानकारी के मुताबिक बिना काम के खर्च करने का यह सिलसिला भी एक-दो साल से नहीं बल्कि पिछले 10 साल (2013) से चल रहा है।
यह जानकारी विनोद जोशी द्वारा दायर एक आरटीआई से सामने आई है
आपको बता दें कि बिना खर्च के काम करने की यह हकीकत सामाजिक कार्यकर्ता विनोद जोशी द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सामने आई है। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार सैयद रजा अब्बास को वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 24 अक्टूबर 2002 को लोकायुक्त बनाया गया था.
वह 2008 तक इस पद पर रहे और फिर एमएम घिल्डियाल ने लोकायुक्त का पदभार संभाला। वह सितंबर 2013 तक इस पद पर रहे। तब से यह कार्यालय बिना लोकायुक्त के चल रहा है।
सितंबर 2013 से काम बंद है
आपको बता दें कि लोकायुक्त की मुख्य जिम्मेदारी भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतें प्राप्त करना और उनका निस्तारण करना है, लेकिन सितंबर 2013 से यह काम बंद है. वर्ष 2013 तक दर्ज 15222 शिकायतों में से केवल 6927 शिकायतों का निस्तारण किया जा सका। उत्तराखंड के लोकायुक्त कार्यालय में कर्मचारियों के वेतन से लेकर सभी प्रमुख मदों में अच्छी खासी रकम खर्च की जा रही है.
डेढ़ करोड़ रुपए सिर्फ वेतन पर खर्च किए गए
बिना लोकायुक्त के चल रहे लोकायुक्त कार्यालय में कर्मचारियों के वेतन पर सालाना करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं. इसके अलावा वाहनों के संचालन/रखरखाव, मजदूरी, फर्नीचर, कंप्यूटर आदि के लिए भी बजट प्रावधान किया गया है।

