देहरादून: उत्तराखंड विधानसभा के पूरक बजट सत्र के दूसरे दिन आज विधानसभा में दो महत्वपूर्ण विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गये. जिसमें उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2022 तथा उत्तराखंड लोक सेवा-महिला क्षैतिज आरक्षण विधेयक 2022 पारित किया गया है। कुछ दिन पहले राज्य सरकार ने कैबिनेट से इन दोनों विधेयकों को मंजूरी दी थी. बुधवार को विधानसभा में इन विधेयकों के पारित होने के साथ ही राज्य में इन्हें लागू करने की अधिसूचना जल्द ही जारी की जाएगी.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड देवभूमि है, जहां धर्म परिवर्तन जैसी चीजें हमारे लिए बहुत खतरनाक हैं. इसलिए सरकार ने तय किया था कि प्रदेश में धर्मांतरण रोकने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाया जाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि इस कानून को राज्य में जल्द से जल्द लागू किया जाए। वहीं उत्तराखंड में महिलाओं के क्षैतिज आरक्षण विधेयक को लेकर मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि उत्तराखंड के निर्माण में मातृशक्ति का बहुत बड़ा योगदान है और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस राज्य में मातृशक्ति का सम्मान सरकार ने पहले ही कर लिया था. उन्हें यह क्षैतिज आरक्षण दिया जाना चाहिए।

धर्मांतरण निषेध कानून क्या है?
भारत के संविधान के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत प्रत्येक के महत्व को समान रूप से मजबूत करने के लिए धर्म, उत्तराखंड धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 में संशोधन की आवश्यकता है। इस अधिनियम के लागू होने के बाद दोषी पाए जाने पर न्यूनतम तीन वर्ष से लेकर अधिकतम 10 वर्ष तक कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।
इतना ही नहीं, अपराध करने वाले को कम से कम पांच लाख रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है, जो पीड़ित को दिया जाएगा। विधेयक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बल, प्रलोभन या धोखाधड़ी के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा। कोई भी व्यक्ति इस तरह के धर्मांतरण के लिए न तो उकसाएगा और न ही षडयंत्र करेगा।
महिला आरक्षण बिल क्या है
उत्तराखंड लोक सेवा (महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण) विधेयक 2022 के तहत राज्य में सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए 20 से 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. यह प्रावधान उन महिलाओं के लिए किया जा रहा है। राज्य गठन के दौरान तत्कालीन सरकार ने 20 फीसदी क्षैतिज आरक्षण की शुरुआत की थी. जुलाई 2006 में इसे घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया।
इसी साल हरियाणा की पवित्रा चौहान और अन्य राज्यों की महिलाओं ने क्षैतिज आरक्षण का लाभ नहीं मिलने पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. हाईकोर्ट ने आरक्षण पर रोक लगा दी थी, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने चार नवंबर 2021 को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए आरक्षण को बरकरार रखा था। अब सरकार ने इस विधेयक को सदन में पारित कर इसे कानूनी रूप दे दिया है, जिसे वर्तमान सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है.

