उत्तराखंड के जौनपुर, रवाई और जौनसार में मनाये जाने वाले माघ(मरोज़) का त्यौहार आज बड़े उत्साह के साथ मनाया जा रहा है ये सिलसिला पूरे एक महीने तक चलता रहता है ।इस अवसर पर सभी लोग एक दूसरे के घर में जा के मेहमान नवाजी करते है। सभी घरों में मीट के साथ समाले पकोडो बनाए जाते है . इस अवसर सभी लोग अपने पारंपरिक परिधान के साथ लोग नृत्य करते है ।
माघ-मरोज के उत्सव में पूरा जौनसार-बावर डूबा हुआ है। जौनसार बावर में लोक संस्कृति के संरक्षण के साथ माघ-मरोज मनाने के लिए इन दिनों बड़ी संख्या में लोग पैतृक गांव पहुंचे हैं. ग्राम-पंचायत में भोज प्रारंभ होने के साथ ही ग्रामीणों ने ढोल-दमोऊ की थाप पर जौनसारी तांदी-नृत्य के साथ हारुल एवं लोकगीतों की भव्य प्रस्तुति दी। जौनसार में पंचायती आंगन देर शाम तक लोकनृत्य से गुंजायमान रहा।

जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर परगना की सीमावर्ती तहसील त्यूणी, चकराता व कालसी तहसील के लगभग 400 गांवों और मकबरों में पारंपरिक माघ-मरोज उत्सव शुरू हो गया है। पौष माह में मनाए जाने वाले माघ-मरोज के पर्व का क्षेत्र के सभी 39 खतों में विशेष महत्व है। जिसे मनाने के लिए बड़ी संख्या में लोग अपने बच्चों के साथ अपने पैतृक गांव पहुंचे हैं. अंचल में माह भर चलने वाले माघ-मरोज पर्व में सत्कार का दौर भी शुरू हो गया है। जिसमें रिश्तेदारों, नातेदार और मेहमानों के घर आने पर उन्हें विशेष दावत दी जाती है।
जब क्षेत्र में माघ-मरोज का उत्सव शुरू हुआ तो गांवों के पंचायती प्रांगणों में ढोल-दमोऊ के हाथों हारुल के साथ झैंता, रासो व तांदी-नृत्य की शानदार प्रस्तुति से नई पीढ़ी को जौनसारी संस्कृति से परिचित कराया गया। माघ-मरोज में पूरे जौनसार बावर क्षेत्र में हजारों बकरे काटे जाने के बाद सोमवार को ग्रामीणों ने रात्रि भोज में आमंत्रित अतिथियों को भरपेट भोजन कराया. गाँव की महिलाओं ने क्षेत्र की पौराणिक परंपरा के अनुसार मेहमानों को पहाड़ी लाल चावल, मांस, रोटी, तिल की चटनी और कई अन्य स्वादिष्ट व्यंजन परोसे। इसके बाद पंचायती आंगन में माघ-मरोज लोकनृत्य की प्रस्तुति के साथ मनाया गया।

