उत्तराखंड में निकाय चुनाव संपन्न हुए करीब दो महीने हो चुके हैं। दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल अपनी-अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टी नगर निगमों और निकायों में अच्छा प्रदर्शन कर आत्मसंतुष्ट हो गई है, जबकि कांग्रेस कुछ नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में जीत दर्ज कर उत्साहित नजर आ रही है।
हालांकि, चुनाव के दौरान कई नेताओं ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहकर भीतरघात किया, लेकिन अब वही नेता फिर से मंचों पर सक्रिय दिखने लगे हैं। यह स्थिति कांग्रेस के लिए एक बड़ा सवाल है—क्या वह 2027 के चुनावों में जीत का सपना इसी तरह देखती रहेगी, या फिर पार्टी को आत्ममंथन कर कोई सबक लेना होगा? पार्टी की इस स्थिति से उसके वफादार कार्यकर्ता असमंजस और निराशा में हैं, जिससे विद्रोह की संभावनाएं भी जन्म ले रही हैं।
राजधानी देहरादून के महापौर चुनाव में एक निर्दलीय प्रत्याशी ने दोनों राष्ट्रीय दलों को चुनौती दी और लगभग 7,000 वोट हासिल किए। यह प्रत्याशी, नेपाली समुदाय के विजय प्रसाद भट्टाराई, गोरखाली समाज के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। अब वे मसूरी विधानसभा क्षेत्र में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं और लगातार क्षेत्र का दौरा कर जनता की समस्याएं उठा रहे हैं।
उनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए गोरखाली समाज ने गोरखाली सुधार सभा में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें सम्मानित किया। उनका प्रभाव यदि इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए भविष्य में चिंता का विषय बन सकता है।
विजय प्रसाद भट्टाराई लंबे समय तक कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं और अब भी उनका झुकाव कांग्रेस की ओर है। संगठन क्षमता और बेबाक वक्तृत्व कला के कारण वे जनता के बीच अपनी बात प्रभावी तरीके से रखते हैं। एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में वे लोगों से घुलने-मिलने में भी माहिर हैं।
यदि राजनीतिक दलों ने उन्हें नजरअंदाज किया, तो आने वाले चुनावों में जीत चाहे किसी की भी हो, लेकिन नुकसान दोनों दलों को उठाना पड़ सकता है।

