मसूरी :
आजकल एक नयी बहस चर्चाओं में है कि अगस्त 1947 में देश बंटवारे के तत्काल बाद एक अंग्रेज लार्ड माऊंटबेटन भारत का गर्वनर जनरल क्यों और कैसे बना,जबकि पाकिस्तान में अंग्रेजों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और मौहम्मद अली जिन्ना गर्वनर जनरल बनाये गये..

Mussoorie Talks with Historian Jaiprakash Uttarakhandi 

क्या हमारी तत्कालिन लीडरशिप पाकिस्तान की लीडरशिप के समक्ष इतनी कमजोर साबित हुई कि हमें आजादी के लंबे संघर्ष और बलिदानों के बाद भी स्वतंत्र भारत में अंग्रेजों का Dominion status स्वीकार करते हुए एक अंग्रेज माऊंटबेटन को आजाद भारत को सर्वोच्च शासक स्वीकार करना पडा?क्या हम पाकिस्तान के बनस्पित अंग्रेजों के समक्ष बौने साबित हुए?
दूसरी तरफ हम देखते हैं कि पाकिस्तान की तत्कालिन लीडरशिप ने अंग्रेज का वर्चस्व स्वीकार नहीं किया, लिहाजा अंग्रेजों को मजबूरन जिन्ना को आजाद पाकिस्तान का सर्वोच्च शासक(गर्वनर जनरल) स्वीकार करना पडा। मेरा ख्याल यह है कि यह अमेरिकी दबाब से संभव हुआ, मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि 1947 में विभाजन के नामपर पाकिस्तान अमेरिका को एक कालोनी के रुप में दिया गया, ताकि भारतीय उपमहाद्वीप में सोवियत संघ के समाजवादी विचार को रोका जा सके।
वैसे यह सब मैं नहीं कह रहा हूँ,बल्कि ब्रिटिश राज के आखिरी दिनों के छ महिनों के बीच जारी हुए गुप्त सरकारी दस्तावेजों के आधार पर प्रकाशित लिनल कार्टर की इतिहास किताब ‘Mountbatten report on the last Viceroyalty’ कह रही है। कार्टर 1946-47 के दिनों में सरकारी रिकार्डरुम का लायब्रेयिन था, जिसने 22 मार्च 1947-15 अगस्त 1947 के बीच सत्ता हस्तांतरण के गुप्त पत्र टपाकर यह किताब लिखी। आजादी के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे एटली ने लिनल कार्टर को गददार बताते हुए बयान दिया था कि कार्टर ने यह सब कर ऐतिहासिक ग्रेट ब्रिटेन को कलंकित किया है…
यह पुस्तक बहुत से भ्रम दूर करती है, जिसपर मैं फिर कभी लिखूंगा।