मसूरी। जौनपुर–रंवाई क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर तेज हो गई है। मंगलवार को मसूरी नगर पालिका के टाउन हॉल में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की संयुक्त बैठक आयोजित की गई, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि यदि जौनपुर–रंवाई को एसटी का दर्जा दिया जाता है तो इसका लाभ पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए, न कि केवल किसी एक हिस्से तक सीमित रखा जाए।

बैठक में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ लोग सीमित क्षेत्र को ही अनुसूचित जनजाति में शामिल कराने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका सभी जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने एक स्वर में विरोध किया। उनका कहना था कि इस तरह का कोई भी प्रयास क्षेत्र की एकता और मूल उद्देश्य के विपरीत होगा।

वक्ताओं ने कहा कि जौनपुर और रंवाई की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारंपरिक पहचान जौनसार–बावर क्षेत्र से काफी हद तक मेल खाती है। यहां की बोली, रहन-सहन, खानपान, रीति-रिवाज और जीवन शैली समान होने के बावजूद वर्ष 1967 में जौनसार–बावर को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला, जबकि जौनपुर–रंवाई इस सूची से बाहर रह गया। उन्होंने कहा कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि वर्ष 1952 से लगातार इस संबंध में आवाज उठाई जाती रही है।

बैठक को संबोधित करते हुए पूर्व पालिकाध्यक्ष मनमोहन सिंह मल्ल ने कहा कि हाल ही में रंवाई और बड़कोट क्षेत्र के कुछ लोगों द्वारा मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे जाने की जानकारी मिलने के बाद सभी जनप्रतिनिधियों ने एकजुट होकर बैठक बुलाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस विषय पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो जौनपुर–रंवाई के गोडर–खाड़र सहित पूरे क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। किसी एक हिस्से को शामिल करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से भी मुलाकात की जाएगी। उनके कार्यकाल में जौनपुर–रंवाई क्षेत्र को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया गया था। साथ ही विषय के विशेषज्ञों और इतिहासकारों से भी चर्चा कर सरकार के समक्ष ऐतिहासिक एवं तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले दिवंगत नेताओं दौलतराम रंवाल्टा, जोत सिंह रंवाल्टा, हुकम सिंह पंवार और सरदार सिंह के योगदान को भी याद किया।

अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की प्रक्रिया

बैठक के दौरान वक्ताओं ने एसटी दर्जा दिए जाने की संवैधानिक प्रक्रिया की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसी भी समुदाय या क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास नहीं होता। राज्य सरकार प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजती है। इसके बाद भारत के रजिस्ट्रार जनरल तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की राय ली जाती है। दोनों संस्थाओं की सहमति मिलने के बाद केंद्र सरकार संसद में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन संबंधी विधेयक प्रस्तुत करती है। संसद से विधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही किसी क्षेत्र या समुदाय को आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त होता है।

बैठक में पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी, पूर्व जिला पंचायत सदस्य अमेंद्र बिष्ट, वीरेंद्र रावत, मेघ सिंह कंडारी, दिनेश बड़ोनी, प्रदीप कवि, सुरेंद्र रावत, दर्शन लाल नौटियाल, राजेश बहुगुणा, शीतल गौड़, वीरपाल कठैत, लोकेंद्र नौटियाल, दीपचंद सजवाण, सरदार सिंह मल्ल, पूर्णानंद डोभाल, शैलेंद्र बिष्ट, दिनेश बर्तवाल, सोबत रावत, पूजा पंवार, महिपाल राणा, गंभीर सिंह नेगी, कपिल भंडारी, मंजीत पंवार सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि एवं क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।